सुप्रीम कोर्ट से भूपेश बघेल की याचिका खारिज
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। मामला साल 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से जुड़ा है, जिसमें पाटन विधानसभा क्षेत्र से भूपेश बघेल की जीत को उनके प्रतिद्वंद्वी भाजपा नेता विजय बघेल ने चुनौती दी थी। इस चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कराने के उद्देश्य से भूपेश बघेल ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने उनकी मांग को ठुकरा दिया है।
क्या है पूरा मामला और आरोप
साल 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के दौरान पाटन सीट पर भूपेश बघेल और भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल के बीच मुकाबला हुआ था। भाजपा नेता विजय बघेल ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि मतदान से 48 घंटे पहले लागू होने वाले 'साइलेंस पीरियड' के दौरान भूपेश बघेल ने रोड शो किया था। विजय बघेल का तर्क है कि यह कृत्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 का सीधा उल्लंघन है। आरोप के अनुसार, मतदान से ठीक एक दिन पहले यानी 16 नवंबर 2023 को यह रोड शो आयोजित किया गया था।
कोर्ट में चली लंबी कानूनी बहस
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने की, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। भूपेश बघेल की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि यदि आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तो यह अधिकतम धारा 126 के तहत एक चुनावी अपराध की श्रेणी में आ सकता है, लेकिन इसे धारा 123 के अंतर्गत 'भ्रष्ट आचरण' यानी करप्ट प्रैक्टिस नहीं माना जाना चाहिए।
परिणाम पर प्रभाव का मुद्दा
कपिल सिब्बल ने अदालत को यह भी बताने की कोशिश की कि इस कथित रोड शो का चुनाव नतीजों पर कोई वास्तविक असर नहीं पड़ा है। उन्होंने दलील दी कि भूपेश बघेल ने 19,723 मतों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि उस समय भूपेश बघेल मुख्यमंत्री थे और उनके पास Z+ सुरक्षा थी, वहीं रोड शो में शामिल लोगों की संख्या भी महज 200 के करीब थी। उनका कहना था कि इतने छोटे से घटनाक्रम को भ्रष्ट आचरण मानकर पूरे चुनाव को विवादित नहीं बनाया जा सकता, इसलिए उन्हें पूरी चुनावी सुनवाई की लंबी प्रक्रिया से गुजरने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायालय का रुख और हाईकोर्ट को निर्देश
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि कथित उल्लंघन ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया है या नहीं, यह तथ्य का प्रश्न है। अदालत ने माना कि इसका निर्धारण साक्ष्यों और सबूतों के आधार पर ही किया जा सकता है। यद्यपि अदालत ने भूपेश बघेल की याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन यह साफ कर दिया कि वे हाईकोर्ट में चल रहे ट्रायल के दौरान अपने बचाव में सभी कानूनी तर्क और आपत्तियां उठाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से मना करते हुए भूपेश बघेल की याचिका को खारिज कर दिया, जिससे अब यह मामला हाईकोर्ट में अपनी कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा। भाजपा नेता विजय बघेल की ओर से दायर यह चुनौती अब चुनाव याचिका के रूप में हाईकोर्ट में अपना रास्ता तय करेगी, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे।
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