मानसून के दौरान गन्ना फसल का प्रबंधन
पश्चिम चंपारण के गन्ना विशेषज्ञ और वैज्ञानिक डॉ. सतीश चंद्र नारायण ने मानसून के मौसम में गन्ना उत्पादक किसानों के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि मानसून का समय गन्ने की फसल के लिए जितना लाभदायक होता है, उतना ही जोखिम भरा भी है। यदि किसान इस दौरान अपनी फसल का सही तरीके से प्रबंधन नहीं करते हैं, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। पश्चिम चंपारण का क्षेत्र बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है, लेकिन लगातार बारिश के चलते खेतों में पानी भर जाना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
जल निकासी क्यों है जरूरी
क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र, माधोपुर के वैज्ञानिक डॉ. सतीश चंद्र नारायण के अनुसार, जिन खेतों में बारिश का पानी जमा हो गया है, वहां से उसे तुरंत बाहर निकालने की व्यवस्था करना बहुत आवश्यक है। यदि खेत में लंबे समय तक पानी भरा रहता है, तो गन्ने की जड़े सड़ने लगती हैं और पौधों का विकास रुक जाता है। लंबे समय तक जलभराव रहने से न केवल जड़ों को नुकसान पहुंचता है, बल्कि फसल की गुणवत्ता भी गिर जाती है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों में पानी न रुकने दें और जल निकासी के लिए उचित नालियां बनाएं ताकि पानी का बहाव बना रहे।
खरपतवार प्रबंधन और उसके लाभ
वैज्ञानिक ने स्पष्ट किया है कि गन्ने की फसल के आसपास उगने वाले खरपतवार फसल के सबसे बड़े दुश्मन साबित हो सकते हैं। खरपतवार न केवल गन्ने के पौधों के पोषण में हिस्सेदारी करते हैं, बल्कि मिट्टी से उर्वरक और पोषक तत्वों को भी तेजी से सोख लेते हैं। डॉ. सतीश चंद्र नारायण ने कहा कि यदि खेत में खरपतवारों का जमाव ज्यादा है, तो गन्ने के पौधों को पर्याप्त पोषण नहीं मिलेगा, जिससे फसल की बढ़वार प्रभावित होगी। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे समय-समय पर हाथों से खरपतवार निकालें। ऐसा करने से न केवल पौधे स्वस्थ रहते हैं, बल्कि फफूंद जनित रोगों के फैलने का खतरा भी काफी हद तक कम हो जाता है। नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करना किसानों के लिए जरूरी है ताकि किसी भी तरह की समस्या का शुरुआत में ही पता चल सके।
जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्में
डॉ. सतीश चंद्र नारायण ने जलजमाव वाले क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों को विशेष गन्ना किस्मों का सुझाव दिया है। उन्होंने बताया कि ऐसी भूमि के लिए राजेंद्र गन्ना-01, राजेंद्र गन्ना-02 और CoP 9301 किस्में सबसे अधिक उपयुक्त हैं। इन किस्मों को वैज्ञानिक तौर पर अधिक नमी और जलभराव वाले क्षेत्रों की चुनौतियों को ध्यान में रखकर ही विकसित किया गया है। इन किस्मों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें फफूंद और सड़न लगने का खतरा अन्य किस्मों की तुलना में काफी कम होता है।
बेहतर उत्पादन और शर्करा की मात्रा
वैज्ञानिक ने बताया कि CoP 9301 किस्म केवल रोगों से बचाव ही नहीं करती, बल्कि यह अधिक पैदावार देने और अच्छी गुणवत्ता वाली चीनी (शर्करा) के लिए भी पहचानी जाती है। जलभराव वाले इलाकों के किसान यदि इन उन्नत किस्मों को चुनते हैं, तो वे अपनी फसल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में बढ़ोतरी कर सकते हैं। मानसून के दौरान थोड़ी सी सतर्कता और उचित कृषि प्रबंधन अपनाकर किसान अपनी फसल को नुकसान से बचा सकते हैं और बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान समय रहते जल निकासी और खरपतवार प्रबंधन पर ध्यान दें, तो उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाली फसल प्राप्त करने में कोई समस्या नहीं होगी।
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