संसद में गूंजा 'कट मनी' का मुद्दा: राघव चड्ढा ने डॉक्टर और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच चल रहे खेल पर उठाए सवाल

राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने चिकित्सा क्षेत्र में मरीजों से जुड़ी रेफरल कमीशन की समस्या को संसद में उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रथा के कारण मेडिकल बिलों में भारी बढ़ोतरी हो रही है और मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

संसद में उठा स्वास्थ्य क्षेत्र का गंभीर मुद्दा

राज्यसभा में गुरुवार का दिन स्वास्थ्य क्षेत्र में पनप रही अनैतिक प्रथाओं पर चर्चा के नाम रहा। भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने सदन के पटल पर डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच चल रहे 'रेफरल कमीशन' और 'कट मनी' के खेल का पर्दाफाश किया। चड्ढा ने आरोप लगाते हुए कहा कि इलाज के नाम पर मरीजों का शोषण किया जा रहा है और कुछ डॉक्टर तथा जांच केंद्र मिलकर मरीजों की जेब ढीली करने का काम कर रहे हैं। इस मुद्दे को उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी साझा किया है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में चड्ढा ने एंटी पेपर लीक कानून पर भी अपनी मुखर राय रखी थी।

अनौपचारिक नेटवर्क से मरीजों की परेशानी

सांसद राघव चड्ढा के अनुसार, वर्तमान में डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच रेफरल इंसेंटिव का एक ऐसा अनौपचारिक नेटवर्क तैयार हो चुका है, जो सीधे तौर पर मरीजों की भलाई के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच केंद्र इसे अपनी बैलेंस शीट में 'मार्केटिंग खर्च' के तौर पर दर्ज करते हैं, जबकि डॉक्टर इसे 'रेफरल कमीशन' का नाम देते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अंततः यह सारा खर्च मरीज के अस्पताल के बिल में जुड़ जाता है। चड्ढा ने सदन के माध्यम से देशवासियों से अपील की कि वे मेडिकल टेस्ट कराने से पहले इस पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली को समझें। उन्होंने चिंता जताई कि कई बार मरीज की बीमारी से ज्यादा महत्व इस बात को दिया जाता है कि उसे कौन से सेंटर पर जांच के लिए भेजा गया है।

इंसेंटिव इकोनॉमी का बढ़ता जाल

राघव चड्ढा ने खुलासा किया कि कई स्थानों पर डॉक्टरों के लिए हर रेफरल पर एक निश्चित कमीशन तय होता है। इस काम को अंजाम देने के लिए बाकायदा अलग एजेंट तैनात किए जाते हैं। चड्ढा ने इसे एक समानांतर 'इंसेंटिव इकोनॉमी' करार दिया है। उन्होंने अपने भाषण में यह भी बताया कि यह कमीशन केवल नकद में ही नहीं, बल्कि अन्य रूपों में भी लिया जाता है। कई डायग्नोस्टिक सेंटर डॉक्टरों को विदेश यात्राओं और अन्य विलासितापूर्ण सुविधाएं भी मुहैया कराते हैं। सांसद का कहना था कि यह सब कुछ मरीजों की गाढ़ी कमाई से वसूला जा रहा है, जिससे मेडिकल जांच और प्रक्रियाओं की लागत काफी बढ़ गई है।

मरीजों की जेब पर 15 से 20 प्रतिशत का अतिरिक्त बोझ

सांसद चड्ढा ने नियम-कानूनों का हवाला देते हुए बताया कि साल 2002 के मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के कोड ऑफ एथिक्स रेगुलेशन 6.4 में इस प्रकार की 'फीस स्प्लिटिंग' पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर्स रेगुलेशन, 2023 के तहत भी इसे अवैध घोषित किया गया है। नियमों के मुताबिक, यदि कोई डॉक्टर इसका उल्लंघन करता है, तो उसका रजिस्ट्रेशन एक से तीन महीने तक सस्पेंड किया जा सकता है। गंभीर मामलों में इसे धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश मानते हुए उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत कार्रवाई का भी प्रावधान है। राघव चड्ढा ने आंकड़े देते हुए कहा कि इस पूरे घालमेल के कारण मरीजों के मेडिकल बिलों में 15 से 20 प्रतिशत तक की अनावश्यक बढ़ोतरी हो रही है। उन्होंने कहा कि केवल बढ़ता बिल ही नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा मेडिकल जांच कराने की प्रवृत्ति भी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ा खतरा है।

मरीजों के लिए सतर्क रहने की सलाह

राघव चड्ढा ने जोर देकर कहा कि देश के अधिकांश डॉक्टर अत्यंत निष्ठा और सेवा भाव से काम कर रहे हैं, लेकिन चंद डॉक्टरों की इन गतिविधियों से पूरे मेडिकल जगत की साख पर बट्टा लग रहा है। उन्होंने मरीजों को सतर्क रहने की सलाह देते हुए कहा कि यदि कोई डॉक्टर किसी एक विशिष्ट लैब या सेंटर पर ही टेस्ट कराने का दबाव बनाता है और दूसरी मान्य लैब की रिपोर्ट को स्वीकार करने से मना करता है, तो यह एक चेतावनी का संकेत है। इसी तरह, यदि किसी डॉक्टर के क्लिनिक में डायग्नोस्टिक सेंटर का मार्केटिंग कर्मचारी या प्रचार सामग्री नजर आए, तो मरीजों को बेहद सावधान हो जाना चाहिए। चड्ढा ने दावा किया कि विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में यह समस्या बहुत तेजी से पैर पसार रही है। उन्होंने सरकार से मांग की कि मरीजों के हितों की सुरक्षा के लिए इस पर सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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