प्रशांत किशोर की बांकीपुर जीत से बिहार की राजनीति में हलचल, क्या तेजस्वी यादव के लिए खतरे की घंटी है यह बदलाव?

बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत ने बिहार की राजनीतिक दिशा बदल दी है। यह न केवल एनडीए के लिए चिंता का विषय है, बल्कि राजद और तेजस्वी यादव के घटते प्रभाव और विपक्ष के नेता के रूप में उनकी साख पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

बांकीपुर उपचुनाव का राजनीतिक प्रभाव

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के परिणाम सामने आने के बाद बिहार की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा जोरों पर है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की इस सीट से शानदार जीत ने राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई संकेत दिए हैं। इसे एनडीए सरकार के प्रति बढ़ते असंतोष के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, यह जीत राजद और उसके युवा चेहरे तेजस्वी यादव के लिए एक बड़े राजनीतिक खतरे की घंटी साबित हो रही है। बिहार में विपक्षी राजनीति की धुरी अब धीरे-धीरे तेजस्वी से हटकर प्रशांत किशोर की ओर झुकती हुई दिखाई दे रही है।

भाजपा के गढ़ में सेंध और राजद की विफलता

बांकीपुर सीट पर भाजपा का वर्चस्व 1995 से रहा है, इसलिए उपचुनाव में पार्टी को मिली हार निश्चित रूप से उनके लिए एक बड़ा झटका है। हालांकि, सबसे ज्यादा परेशानी इस बात की है कि इस सीट पर मुख्य विपक्षी दल के रूप में राजद की पकड़ कमजोर हुई है। राजद के पास अब भी विधायकों का बड़ा कुनबा है और राज्य में उनका वोट बैंक अन्य दलों की तुलना में अधिक है, जिस आधार पर लालू यादव अपने बेटे को मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे थे। लेकिन प्रशांत किशोर की एंट्री और उनकी जीत ने यह साबित कर दिया है कि जनता अब एनडीए और महागठबंधन के पुराने ढर्रे से ऊब चुकी है और एक नए विकल्प की तलाश में है।

तेजस्वी यादव की निष्क्रियता और हताशा

साल 2025 के चुनाव के बाद से तेजस्वी यादव की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। विधानसभा के अब तक के तीन सत्रों में से वे सिर्फ एक सत्र में ही शामिल हो पाए। शपथ लेने के तुरंत बाद उनका विदेश दौरे पर निकल जाना और मानसून सत्र के दौरान अनुपस्थित रहना उनकी गंभीरता पर संदेह पैदा करता है। बांकीपुर उपचुनाव के दौरान भी वे काफी देरी से लौटे, जिसके कारण चुनाव प्रचार में जान नहीं फूंक पाए। एनडीए जैसे मजबूत गठबंधन के सामने राजद के उम्मीदवार के पास कोई ठोस रणनीति नहीं थी। इसका नतीजा यह हुआ कि 2025 में दूसरे नंबर पर रहने वाली राजद इस बार तीसरे स्थान पर खिसक गई और उनकी उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई।

विपक्ष की भूमिका पर उठा सवाल

राजनीति में केवल सदन का नेता होना ही काफी नहीं होता है। विपक्ष का असली अर्थ होता है जनता के मुद्दों को सड़क से लेकर सदन तक उठाना। प्रशांत किशोर ने भले ही 2025 के विधानसभा चुनाव में 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उस समय उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे मैदान में डटे रहे, जिसका सकारात्मक परिणाम उन्हें बांकीपुर में मिला है। इसके उलट, तेजस्वी यादव ने सदन की शपथ लेने के बाद 100 दिनों के भीतर एनडीए की नीतियों पर हमला करने का वादा किया था। उन्होंने वादा किया था कि यदि महिलाओं को 2,00,000 रुपये और 1,00,00,000 सरकारी नौकरियां नहीं मिलीं, तो वे बड़ा आंदोलन करेंगे। हालांकि, अब 150 दिन बीत जाने के बाद भी राजद की ओर से कोई ठोस आंदोलन देखने को नहीं मिला है। इसके विपरीत, प्रशांत किशोर ने भरत तिवारी एनकाउंटर जैसे मामलों में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोलकर अपनी सक्रियता सिद्ध की है।

वोट बैंक का भ्रम और जमीनी हकीकत

राजद नेताओं का अब भी यह मानना है कि उनका जनाधार सुरक्षित है। 2025 के विधानसभा चुनाव में राजद को 1,15,46,055 वोट यानी 23.87 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली थी, जो किसी भी अन्य दल से अधिक थी। भाजपा को 1,00,81,143 वोट (20.84 प्रतिशत) और जदयू को 96,67,118 वोट (19.99 प्रतिशत) मिले थे। इसी आंकड़े के गुमान में राजद को लगता है कि उनका मुस्लिम-यादव समीकरण अटूट है। लेकिन बांकीपुर के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। नवंबर 2025 में राजद की उम्मीदवार रेखा कुमारी को 46,363 वोट यानी 29.83 प्रतिशत वोट मिले थे, जो अगस्त 2026 के उपचुनाव में गिरकर मात्र 14,273 वोट यानी 10.95 प्रतिशत पर सिमट गए। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि राजद का सामाजिक समीकरण ध्वस्त हो रहा है और इसका लाभ एनडीए को मिलने के बजाय जन सुराज को मिल रहा है।

नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर संकट

तेजस्वी यादव के लिए राजनीतिक संकट केवल हार तक सीमित नहीं है। राज्यसभा चुनाव के दौरान उनके दल का एक विधायक पाला बदल चुका है, और महागठबंधन के अन्य सहयोगी भी उनके साथ सहज महसूस नहीं कर रहे हैं। विपक्ष के नेता के तौर पर उनकी कुर्सी बचाने के लिए न्यूनतम 25 विधायकों की आवश्यकता है। यदि संख्या बल में और गिरावट आती है, तो उनकी यह कुर्सी भी छिन सकती है। चर्चाएं यह भी हैं कि राजद के 4 में से 3 सांसद पाला बदलने की फिराक में हैं। अभय कुशवाहा की सम्राट चौधरी के साथ मुलाकात को भी इसी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रशांत किशोर की सदन में उपस्थिति तेजस्वी की वक्तृता और राजनीतिक मेधा के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाली है। आने वाले समय में तेजस्वी के लिए यह स्थिति और भी अधिक चुनौतीपूर्ण और खतरनाक साबित हो सकती है।

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