अजगैबीनाथ मंदिर: जहाँ से शुरू होती है बाबा बैद्यनाथ की जलयात्रा, वहां के पुजारी क्यों नहीं जाते देवघर

भागलपुर के सुल्तानगंज स्थित प्राचीन अजगैबीनाथ मंदिर से जुड़ी एक अनूठी परंपरा है कि यहाँ के पुजारी देवघर की यात्रा नहीं करते। इसके पीछे की पौराणिक कथा और मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को विस्तार से समझें।

अजगैबीनाथ मंदिर और देवघर यात्रा का अनूठा संबंध

सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही लाखों की संख्या में श्रद्धालु सुल्तानगंज के उत्तरवाहिनी गंगा तट पर जुटते हैं। यहाँ से जल भरकर कांवड़िये देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर प्रस्थान करते हैं। यह यात्रा अजगैबीनाथ मंदिर से होकर गुजरती है, जिसे जलयात्रा का प्रारंभिक बिंदु माना जाता है। हालांकि, एक हैरान करने वाली बात यह है कि इस मंदिर के पुजारी कभी भी देवघर जाकर बाबा भोलेनाथ पर जलार्पण नहीं करते हैं। मंदिर के मठाधीश प्रेमानंद गिरि ने इस परंपरा के पीछे की पौराणिक मान्यताओं और मंदिर के इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

1885 से भी पुराना है मंदिर का इतिहास

अजगैबीनाथ मंदिर की भव्यता और इसका इतिहास बेहद प्राचीन है। मंदिर के मठाधीश महाराज प्रेमानंद गिरि के अनुसार, इस मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज वर्ष 1885 का है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मंदिर का निर्माण और इसकी महत्ता इस तिथि से भी बहुत पहले की रही होगी। ऐतिहासिक दस्तावेजों और मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष ध्वज को रानी कलावती ने दान में दिया था। मंदिर की वास्तुकला की बात करें तो यह ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है और पूरी तरह से नाव के आकार में बसा हुआ है। इसे बिहार के सबसे अद्भुत और प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। माना जाता है कि पहले यह मंदिर गंगा नदी के बिल्कुल बीच में स्थित था, लेकिन समय के साथ गंगा की धारा में बदलाव आने के कारण अब यह तट के समीप दिखाई देता है।

क्यों देवघर नहीं जाते अजगैबीनाथ के पुजारी

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, हजारों वर्ष पूर्व दो ऋषि-मुनि नित्य नियम से सुल्तानगंज से जल भरकर देवघर ले जाते थे और बाबा बैद्यनाथ का अभिषेक करते थे। एक दिन भगवान शिव ने उनकी निष्ठा और भक्ति की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। जब वे दोनों ऋषि जल लेकर जा रहे थे, तो मार्ग में भगवान शिव ने एक साधारण व्यक्ति के रूप में प्रकट होकर उनसे जल पीने की मांग की। उन ऋषियों ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया और कहा कि यह जल वे बाबा बैद्यनाथ को अर्पण करने ले जा रहे हैं, इसलिए वे इसे किसी को नहीं दे सकते।

उनकी अटूट श्रद्धा और सेवा भाव से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अब से उन्हें इतनी दूर जल लेकर जाने की आवश्यकता नहीं है। भगवान ने उनसे कहा कि सुल्तानगंज में ही उन्हें दो शिवलिंग प्राप्त होंगे, वे उन्हीं की पूजा करें। उन्होंने यह भी कहा कि श्रृंगार पूजा से पहले वे स्वयं सुल्तानगंज में ही वास करेंगे, उसके बाद ही वे वैद्यनाथ धाम जाएंगे। इस घटना के बाद से ही यहां के पुजारियों के लिए देवघर जाना वर्जित माना जाने लगा।

क्या कहते हैं मंदिर के मठाधीश

मंदिर के मठाधीश प्रेमानंद गिरि ने साझा किया कि यह परंपरा आज भी कायम है। उन्होंने बताया कि सरकारी पूजा संपन्न होने से पहले जो भी जल चढ़ाया जाता है, वह सीधे देवघर के बाबा को समर्पित माना जाता है। सरकारी पूजा के बाद जो भी जल चढ़ाया जाता है, वह अजगैबीनाथ को समर्पित होता है। उन्होंने अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक बार उन्होंने भी जल लेकर देवघर जाने का प्रयास किया था, लेकिन उनकी आंखों में गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई। उस घटना के बाद उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी और संकल्प लिया कि वे कभी वहां नहीं जाएंगे।

मनोकामना शिवलिंग की महिमा

अजगैबीनाथ मंदिर को एक सिद्ध स्थान माना जाता है। श्रद्धालु इस स्थान को मनोकामना शिवलिंग के रूप में जानते हैं। जनमानस में ऐसी गहरी आस्था है कि जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मनोकामना लेकर यहां पहुंचता है, भगवान उसकी मुराद अवश्य पूरी करते हैं। यही कारण है कि सावन के दौरान लाखों की संख्या में कांवड़िये यहां से जल लेकर अपनी यात्रा की शुरुआत करते हैं। मंदिर के साथ जुड़ी ये प्राचीन मान्यताएं और रहस्य इसे न केवल एक धार्मिक स्थल बनाते हैं, बल्कि इसे भारतीय परंपराओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी स्थापित करते हैं।

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