बेऊर जेल कांड: निलंबित अधिकारियों के अवैध प्रवेश और साक्ष्यों से छेड़छाड़ पर सख्त कार्रवाई, 4 कक्षपाल सस्पेंड

पटना के बेऊर जेल में निलंबित अधिकारियों के अनाधिकृत प्रवेश और दस्तावेजों के साथ कथित हेराफेरी के मामले में कारा प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। मामले में चार कक्षपालों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है और उपाधीक्षक को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

बेऊर जेल में सुरक्षा की भारी चूक

पटना की बहुचर्चित बेऊर जेल से एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है, जिसने राज्य की जेल सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। इस मामले में उन अधिकारियों को जेल परिसर के अंदर प्रवेश करने की अनुमति दी गई, जिन्हें पहले ही निलंबित किया जा चुका था। आरोप है कि इन निलंबित अधिकारियों ने न केवल जेल के संवेदनशील इलाकों तक पहुंच बनाई, बल्कि वहां मौजूद महत्वपूर्ण फाइलों की छानबीन की और सरकारी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ भी की। इस पूरी घटना में कथित तौर पर जेल के भीतर मौजूद कुछ अहम साक्ष्यों को परिसर से बाहर ले जाने का प्रयास भी किया गया है।

उपाधीक्षक और कक्षपालों पर गिरी गाज

कारा प्रशासन ने इस पूरे घटनाक्रम को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए त्वरित कार्रवाई शुरू कर दी है। जेल के उपाधीक्षक सुधीर शर्मा को तत्काल प्रभाव से कारण बताओ नोटिस (शो-कॉज) जारी किया गया है। विभाग ने उनसे स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर उनकी देखरेख में निलंबित अधिकारियों को जेल के भीतर घुसने की अनुमति कैसे मिली और इस गंभीर सुरक्षा चूक के लिए वे खुद को कैसे जिम्मेदार मानते हैं।

इसके साथ ही, चार कक्षपालों को सेवा से निलंबित कर दिया गया है। इन निलंबित कक्षपालों में संजीव कुमार गुप्ता, धीरज कुमार, उमेश कुमार और अजय जान मरांडी शामिल हैं। विभागीय जांच में प्रथम दृष्टया इन पर यह आरोप साबित हुआ है कि इन्होंने अपनी ड्यूटी के दौरान नियमों की अनदेखी की और निलंबित अधिकारियों को न केवल प्रवेश दिलाया, बल्कि उनकी गतिविधियों में सहयोग भी प्रदान किया।

जेल अधीक्षकों की भूमिका की भी जांच

इस पूरे मामले की आंच पटना तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा अन्य जिलों तक भी फैल गया है। कारा विभाग ने शेखपुरा, सुपौल और कटिहार के जेल अधीक्षकों को भी विशेष नोटिस जारी किया है। इन अधिकारियों से पूछा गया है कि जब उक्त निलंबित अधिकारियों की पदस्थापना उनके संबंधित जेलों में थी, तो फिर उनके जेल परिसर में प्रवेश करने की सूचना समय रहते मुख्यालय को क्यों नहीं दी गई। विभाग इस बात की गहन पड़ताल कर रहा है कि क्या यह महज एक प्रशासनिक लापरवाही का मामला है या फिर जानबूझकर महत्वपूर्ण जानकारी को छिपाने का प्रयास किया गया है।

प्राथमिकी दर्ज और आगे की कानूनी कार्रवाई

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए, बीते 28 जुलाई को बेऊर थाने में विधिवत रूप से प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कर ली गई है। वर्तमान में पुलिस और विभागीय स्तर पर समानांतर जांच चल रही है। कारा प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी दोषी अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा। विभागीय कार्रवाई के अलावा, पुलिस जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर दोषियों के विरुद्ध कानून की सुसंगत धाराओं के तहत कठोर कानूनी कदम उठाए जाएंगे।

सुरक्षा व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल

बेऊर जेल को बिहार की सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील जेलों में शुमार किया जाता है। ऐसे में निलंबित अधिकारियों का फाइलों तक पहुंच बनाना और दस्तावेजों के साथ खिलवाड़ करना सुरक्षा की बहुत बड़ी विफलता को दर्शाता है। आम जनमानस और प्रशासनिक गलियारों में अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह सब कुछ लापरवाही के कारण हुआ या फिर किसी सोची-समझी साजिश के तहत नियमों को ताक पर रखा गया। अब सबकी निगाहें जांच की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि इस पूरे प्रकरण के पीछे असली मास्टरमाइंड कौन था और जेल की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले किस हद तक अपनी जवाबदेही से चूके हैं।

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