पिता की खेती संवारने का था सपना, किस्मत ने कृषि वैज्ञानिक बनाकर बदल दी हजारों किसानों की तकदीर

उत्तर प्रदेश के एक साधारण किसान परिवार से आने वाले डॉ. देवेंद्र कुमार ने कृषि वैज्ञानिक के रूप में लगभग 40 साल तक किसानों की सेवा की और हाल ही में पूसा विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए हैं।

हर व्यक्ति अपने बचपन में जीवन को लेकर कोई न कोई सपना संजोता है। कई लोग उस सपने को पूरा करने में सफल होते हैं, तो कई लोगों की किस्मत उन्हें एक अलग और अधिक प्रभावशाली रास्ते पर ले जाती है। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले से आने वाले डॉ. देवेंद्र कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बचपन में अपने पिता की 20 एकड़ जमीन पर आधुनिक खेती करने का सपना देखने वाले देवेंद्र कुमार को शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि एक दिन वह देश के जाने-माने कृषि वैज्ञानिक बनकर हजारों किसानों की जिंदगी में खुशहाली लाएंगे।

हाल ही में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के ईख अनुसंधान केंद्र के विभागाध्यक्ष यानी HOD पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपने जीवन के इस अविश्वसनीय सफर के अनुभव साझा किए। डॉ. देवेंद्र कुमार का मानना है कि उन्होंने केवल एक नौकरी नहीं की, बल्कि किसानों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में अपना योगदान दिया, जो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

खेती-किसानी के बीच बीता बचपन और बदला इरादा

डॉ. देवेंद्र कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के एक पारंपरिक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता के पास करीब 20 एकड़ कृषि भूमि थी, जिसके कारण उनका बचपन मिट्टी और फसलों के बीच ही बीता। खेतों में लगातार काम करने के कारण उनके मन में यह विचार आया कि वह कृषि क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे और फिर अपने गांव लौटकर पारंपरिक खेती को आधुनिक तकनीकों से उन्नत बनाएंगे।

हालांकि, जब उन्होंने विश्वविद्यालय में कृषि की पढ़ाई शुरू की, तो उनके विचारों का दायरा विस्तृत हो गया। उन्हें अहसास हुआ कि अगर वह सिर्फ अपने पारिवारिक खेतों तक सीमित रहेंगे तो केवल अपने परिवार की मदद कर पाएंगे, लेकिन यदि वह एक कृषि वैज्ञानिक बनते हैं, तो देश भर के हजारों-लाखों किसानों के जीवन को बदलने की क्षमता रखेंगे। इसी प्रेरणादायक सोच ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा को एक नया और समाजोपयोगी मोड़ दे दिया।

शैक्षणिक सफलता और वैज्ञानिक के रूप में पहली नियुक्ति

वैज्ञानिक बनने की अपनी राह पर आगे बढ़ते हुए डॉ. देवेंद्र कुमार ने कृषि विज्ञान के महत्वपूर्ण विषय एग्रोनॉमी में MSC की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद, उन्होंने उच्च अनुसंधान के क्षेत्र में कदम रखा और वर्ष 1984 में PHD के लिए अपना पंजीकरण कराया। अपनी कड़ी मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने वर्ष 1989 में PHD की मानद उपाधि प्राप्त की और अपने पूरे बैच में प्रथम स्थान हासिल कर टॉपर बने।

अपनी पढ़ाई के दौरान उन्हें देश के कई दिग्गज और नामचीन कृषि वैज्ञानिकों के सानिध्य में शोध करने और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि PHD की डिग्री पूरी होने से तीन साल पहले ही, यानी वर्ष 1986 में उन्हें वैज्ञानिक के रूप में पहली नौकरी मिल गई थी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपना पूरा जीवन कृषि अनुसंधान को समर्पित कर दिया।

40 वर्षों की लंबी सेवा और प्रमुख योगदान

एक बार जब डॉ. देवेंद्र कुमार ने वैज्ञानिक के रूप में अपनी सेवाएं शुरू कीं, तो उनका सफर देश के विभिन्न हिस्सों में कृषि विकास की नई कहानियां लिखता चला गया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआती पारी कैमूर से शुरू की थी। इसके बाद उन्होंने कोसी क्षेत्र और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परियोजना में अपनी सेवाएं दीं।

वर्ष 1992 से 2001 के बीच का समय उनके करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ, जब उन्होंने बेगूसराय में कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना और उसके प्रारंभिक विकास में एक मुख्य सूत्रधार के रूप में काम किया। बेगूसराय में उन्होंने सीधे तौर पर किसानों के बीच जाकर उन्हें उन्नत बीजों के प्रयोग, आधुनिक कृषि उपकरणों और वैज्ञानिक तौर-तरीकों के बारे में प्रशिक्षित किया। अपने सेवाकाल के अंतिम पड़ाव में उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के प्रतिष्ठित ईख अनुसंधान केंद्र में विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी बेहद कुशलता से संभाली।

खेतों को ही बनाया अपनी वास्तविक प्रयोगशाला

डॉ. देवेंद्र कुमार हमेशा से एक अलग सोच रखने वाले वैज्ञानिक रहे हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि किसी भी कृषि वैज्ञानिक के शोध का असली मूल्यांकन प्रयोगशाला की चार दीवारों के भीतर नहीं, बल्कि किसानों के खेतों की हरी-भरी फसलों में होता है। उनका मानना था कि वैज्ञानिकों के शोध और तकनीकों का असली लाभ तभी है, जब वे अंतिम कतार में खड़े किसान के खेत तक पहुंचें और उसकी फसल की पैदावार बढ़ाएं।

इसी जन-कल्याणकारी दृष्टिकोण के साथ उन्होंने अपने चार दशक के करियर में लगातार ग्रामीण इलाकों का दौरा किया, किसानों के साथ बैठकर चौपालें आयोजित कीं और उनकी व्यावहारिक समस्याओं का मौके पर ही वैज्ञानिक समाधान निकाला। उनकी इस जमीनी कार्यशैली का ही परिणाम था कि क्षेत्र के हजारों किसानों ने अपनी पुरानी खेती छोड़कर नई तकनीक अपनाई और अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ाने में सफलता पाई।

विदाई की बेला में छलका दर्द और संतुष्टि का भाव

अपने विदाई समारोह के दौरान डॉ. देवेंद्र कुमार काफी भावुक नजर आए। विश्वविद्यालय प्रशासन और सहकर्मियों द्वारा दिए गए सम्मान से अभिभूत होकर उन्होंने कहा कि पूसा विश्वविद्यालय ने उन्हें एक वैज्ञानिक के तौर पर बहुत कुछ दिया है, और उन्होंने भी हमेशा समाज को अपनी सर्वश्रेष्ठ सेवाएं वापस लौटाने का प्रयास किया।

उन्होंने अत्यंत विनम्रता से कहा कि उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार या पदक कोई सरकारी सम्मान नहीं है, बल्कि वह पल है जब कोई साधारण किसान मुस्कुराते हुए उनके पास आता है और कहता है कि उनकी वैज्ञानिक सलाह के कारण उसकी फसल अच्छी हुई है और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरी है। किसानों के चेहरों की यही खुशी उनके 40 सालों के लंबे सफर की असली कमाई और जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है।

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