बालाघाट का ऐतिहासिक जामेश्वर मंदिर
मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला इन दिनों एक बेहद अनोखे और रहस्यमयी मंदिर को लेकर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। सावन के पवित्र महीने में वैसे तो देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, लेकिन कटंगी विकासखंड के ग्राम जाम में स्थित यह प्राचीन जामेश्वर मंदिर अपनी विशिष्ट वास्तुकला और एक चमत्कारिक पेड़ की वजह से भक्तों और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर करीब 10वीं शताब्दी का बताया जाता है, जो अपनी बनावट और स्थापत्य कला के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बिना जड़ों का रहस्यमयी पेड़
इस मंदिर की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली विशेषता इसकी छत पर उगा हुआ एक रहस्यमयी पेड़ है। यह कोई साधारण पेड़ नहीं है, क्योंकि इसकी जड़ें जमीन तक नहीं पहुंचती हैं। हैरानी की बात यह है कि इसकी जड़ें मंदिर की छत पर ही समाप्त हो जाती हैं, जिसका अर्थ है कि इसे पोषण प्राप्त करने के लिए मिट्टी का कोई सहारा नहीं मिलता। स्थानीय ग्रामीण और मंदिर में आने वाले भक्त अटूट विश्वास के साथ कहते हैं कि इस पेड़ का पालन-पोषण स्वयं भगवान शिव करते हैं, इसीलिए यह बिना किसी प्राकृतिक स्रोत के वर्षों से अडिग खड़ा है।
मौसम के साथ बदलता स्वरूप
इस पेड़ के बारे में वैज्ञानिक और स्थानीय लोग अभी तक यह भी पता नहीं लगा सके हैं कि यह किस प्रजाति का है। इसकी जीवनशैली और मौसम के साथ बदलाव बेहद अनोखे हैं। भीषण गर्मी के दौरान, जब चारों तरफ लू चलती है और अन्य पेड़ सूखने की कगार पर होते हैं, तो यह पेड़ भी पूरी तरह सूख जाता है। उस समय इसकी टहनियों को देखकर ऐसा लगता है कि यह अब गिर जाएगा, लेकिन जैसे ही मानसून की पहली फुहारें पड़ती हैं, यह पेड़ पुनर्जीवित हो उठता है। बारिश की बूंदें गिरते ही इसमें नई जान आ जाती है और यह फिर से हरा-भरा होकर मुस्कुराने लगता है।
शोधकर्ताओं के लिए पहेली
इस पेड़ की मजबूती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां गांव के अन्य बड़े और स्वस्थ पेड़ आंधी-तूफान के समय गिर जाते हैं, वहीं मंदिर की छत पर खड़ा यह पेड़ हर मौसम की मार झेलते हुए सुरक्षित रहता है। कई शोधकर्ताओं ने इस विषय पर अध्ययन करने का प्रयास किया है, लेकिन वे यह देखकर दंग रह जाते हैं कि बिना जमीन के संपर्क और मिट्टी के अभाव में यह पेड़ आखिर पोषण कैसे प्राप्त कर रहा है। आज भी इसके जीवित रहने का आधार विज्ञान के लिए एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है, जबकि भक्तों के लिए यह स्पष्ट रूप से एक दैवीय चमत्कार है।
स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना
जामेश्वर मंदिर केवल अपने पेड़ के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध है। यह मंदिर 10वीं शताब्दी के दौरान निर्मित किया गया था और इसकी पूरी संरचना एक ही विशाल चट्टान को काटकर तैयार की गई है। मंदिर की छत पूरी तरह से ठोस पत्थर से बनी है, जो उस समय के शिल्पकारों की अद्भुत इंजीनियरिंग कौशल को दर्शाती है। मंदिर के अंदर पत्थरों पर उकेरी गई सुंदर कलाकृतियां आज भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
श्रद्धालुओं की अटूट आस्था
सावन के महीने में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है और खासकर सोमवार के दिन शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए लंबी कतारें देखी जा सकती हैं। इस मंदिर की महिमा बालाघाट तक ही सीमित नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहां विशेष पूजा और बड़े धार्मिक आयोजनों का प्रबंध किया जाता है, जिसमें दूर-दूर से भक्त शामिल होकर पुण्य लाभ कमाते हैं।
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