जॉर्डन की नौकरी छोड़ फरीदाबाद के युवक ने शुरू की दंडवत कांवड़ यात्रा, प्रेमानंद महाराज की सेहत के लिए कर रहे कठिन तपस्या

फरीदाबाद के रहने वाले रमन ने जॉर्डन में अपनी अच्छी खासी नौकरी का त्याग कर दिया है और वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज के बेहतर स्वास्थ्य की मन्नत के साथ हरिद्वार से वृंदावन तक दंडवत कांवड़ यात्रा पर निकल पड़े हैं।

गुरु के प्रति अटूट आस्था की मिसाल

आध्यात्म और गुरु के प्रति श्रद्धा जब चरम पर होती है, तो इंसान सांसारिक सुखों को त्यागने में जरा भी संकोच नहीं करता। इसका एक अद्भुत उदाहरण हरियाणा के फरीदाबाद जिले के सरूरपुर गांव के रहने वाले 28 वर्षीय रमन ने पेश किया है। आमतौर पर लोग बेहतर भविष्य और धन कमाने के लिए विदेशों का रुख करते हैं, लेकिन रमन ने इसके विपरीत मार्ग चुना। उन्होंने जॉर्डन में चल रही अपनी अच्छी-खासी नौकरी को छोड़कर भारत वापसी की और अब वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए एक बेहद कठिन आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़े हैं।

दंडवत कांवड़ यात्रा का कठिन संकल्प

रमन इस समय हरिद्वार से वृंदावन तक की दंडवत कांवड़ यात्रा कर रहे हैं। उनके हाथ में चार लीटर गंगाजल है। इस यात्रा की विशेषता यह है कि यह सामान्य कांवड़ यात्रा से कहीं अधिक श्रमसाध्य और कष्टकारी होती है। दंडवत यात्रा के दौरान श्रद्धालु को हर कुछ कदम चलने के बाद जमीन पर पूरी तरह लेटना पड़ता है और फिर उसी स्थान से उठकर आगे बढ़ना होता है। रमन का संकल्प है कि वे इसी कठिन प्रक्रिया का पालन करते हुए वृंदावन पहुंचेंगे और वहां उस गंगाजल से प्रेमानंद महाराज का स्नान कराकर अपनी मन्नत पूरी करेंगे। उनके मन में केवल एक ही कामना है कि उनके गुरु जल्द से जल्द पूरी तरह स्वस्थ हो जाएं।

सहयोगी दल का मिला साथ

अपनी इस चुनौतीपूर्ण यात्रा में रमन अकेले नहीं हैं। उनके साथ उनके दो भाई और तीन मित्र भी चल रहे हैं, जो उनके इस सफर को सुगम बनाने में पूरी भूमिका निभा रहे हैं। यह दल लगातार उनके साथ रहकर खाने-पीने, विश्राम करने की व्यवस्था और उनके पास मौजूद चार लीटर गंगाजल की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। इन साथियों के सहयोग से ही रमन का यह संकल्प बिना किसी बड़ी बाधा के आगे बढ़ पा रहा है।

जॉर्डन की नौकरी और वैराग्य

रमन ने अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताया कि वह करीब पांच साल तक जॉर्डन की एक निर्यात कंपनी में को-ऑर्डिनेटर के पद पर तैनात थे। वहां उन्हें हर महीने 45 हजार रुपये का वेतन मिलता था, जिससे उनका जीवन काफी आरामदायक था। हालांकि, करीब तीन साल पहले उन्होंने इंटरनेट के माध्यम से प्रेमानंद महाराज के प्रवचन सुनने शुरू किए। धीरे-धीरे यह श्रद्धा इतनी गहरी हो गई कि उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरु के प्रति समर्पित करने का मन बना लिया। जब उन्हें महाराज के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बारे में पता चला, तो उन्होंने बिना किसी देरी के नौकरी से त्यागपत्र दिया और भारत लौटने का निर्णय लिया।

श्रद्धा के आगे चुनौतियां छोटी

रमन के अनुसार, उन्होंने अपनी यह संकल्प यात्रा 22 जुलाई से शुरू की थी। हालांकि वे पहले 12 बार हरिद्वार से कांवड़ ला चुके हैं, लेकिन दंडवत कांवड़ का अनुभव उनके लिए पहली बार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बार की यात्रा में उन्होंने अपने लिए कोई भौतिक सुख नहीं मांगा है, बल्कि केवल गुरु की सेवा का भाव रखा है। रास्ते में उन्हें उत्तर प्रदेश प्रशासन की ओर से कांवड़ियों के लिए की गई बेहतरीन व्यवस्थाओं का अनुभव हुआ, जहां सुरक्षा और ट्रैफिक के इंतजाम संतोषजनक थे। हालांकि, फरीदाबाद में पहुंचने पर उन्हें भारी यातायात और लंबे जाम का सामना करना पड़ा। चूंकि यह दंडवत यात्रा है, इसलिए जाम के बीच आगे बढ़ना और भी कठिन हो गया है, लेकिन रमन का कहना है कि उनकी सच्ची आस्था ही उन्हें हर दिन आगे बढ़ने की अद्भुत शक्ति दे रही है और वे किसी भी हाल में अपनी इस यात्रा को पूर्ण करके ही दम लेंगे।

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