बांकीपुर उपचुनाव के रुझानों से बिहार में भारी सियासी हलचल, क्या तेजस्वी यादव की इस बड़ी भूल ने प्रशांत किशोर के लिए तैयार किया नया मैदान?

पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव के शुरुआती रुझानों ने बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है, जहां जनसुराज के प्रशांत किशोर बड़ी बढ़त हासिल कर मुख्यधारा की राजनीति में हलचल मचा रहे हैं।

बिहार की राजनीति में समय-समय पर बड़े बदलाव देखने को मिलते रहे हैं, लेकिन पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव के शुरुआती रुझानों ने एक ऐसा सियासी भूचाल ला दिया है जिसकी कल्पना शायद मुख्यधारा के बड़े राजनीतिक दलों ने नहीं की थी। इस सीट पर मतगणना के जो शुरुआती आंकड़े सामने आ रहे हैं, उन्होंने बिहार के राजनैतिक गलियारों में एक नई और गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। आठवें राउंड की गिनती पूरी होने तक जनसुराज के प्रशांत किशोर लगातार अपनी बढ़त को मजबूत करते जा रहे हैं, जबकि सत्ताधारी भाजपा दूसरे और मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) तीसरे स्थान पर पिछड़ गया है। यद्यपि अंतिम परिणामों की घोषणा होना अभी शेष है, परंतु इन रुझानों ने बिहार की राजनीति के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या तेजस्वी यादव ने अपनी ढुलमुल और पारंपरिक राजनीतिक रणनीति के कारण अनजाने में ही सही, प्रशांत किशोर के लिए बिहार की जमीन पर एक बड़ा राजनीतिक मैदान खाली छोड़ दिया है।

बांकीपुर के चुनावी रण के चौंकाने वाले आंकड़े

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के शुरुआती परिणाम बिहार के स्थापित राजनैतिक दलों की पेशानी पर बल लाने के लिए पर्याप्त हैं। आठवें राउंड की मतगणना समाप्त होने पर जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। जनसुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर 15,000 से अधिक मतों की बड़ी और निर्णायक बढ़त के साथ सबसे आगे चल रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, बांकीपुर को पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी का बेहद सुरक्षित किला माना जाता रहा है। लेकिन इस चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा केवल 10,000 से अधिक वोट हासिल करके दूसरे पायदान पर खिसक गए हैं। सबसे अधिक निराशाजनक और चौंकाने वाले आंकड़े राष्ट्रीय जनता दल के खेमे से आए हैं। राजद की ओर से चुनावी मैदान में उतरीं रेखा गुप्ता को केवल 2500 से कुछ अधिक मत प्राप्त हुए हैं, जिसके कारण वे बेहद चिंताजनक तरीके से तीसरे स्थान पर संघर्ष कर रही हैं। यह केवल एक प्रत्याशी का पिछड़ना नहीं है, बल्कि यह राजद के सिकुड़ते जनाधार की वह कहानी बयां कर रहा है जो तेजस्वी यादव के रणनीतिक कौशल पर सवाल उठाती है।

तेजस्वी की 'माई' और 'ए टू जेड' राजनीति को तगड़ा झटका

बिहार की राजनीति में अब तक यह एक स्थापित तथ्य माना जाता रहा है कि कोई भी मुकाबला सीधे तौर पर राष्ट्रीय जनता दल और भारतीय जनता पार्टी के बीच ही केंद्रित रहता है। लेकिन बांकीपुर उपचुनाव के इन रुझानों ने इस स्थापित धारणा को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। राजद के लिए इस सीट पर इतने कम वोट पाना एक बहुत बड़ा झटका है। पार्टी के नेता तेजस्वी यादव लंबे समय से अपने पारंपरिक 'माई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाली 'ए टू जेड' राजनीति का दावा करते रहे हैं। हालांकि, बांकीपुर के चुनावी नतीजों के रुझान बताते हैं कि यह रणनीति इस बार पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है। पांचवें राउंड की गिनती ने यह साफ कर दिया था कि राजद मुख्य मुकाबले की दौड़ से बाहर हो चुकी है और अब उसे अपने इस कमजोर प्रदर्शन पर गंभीरता से विचार करना होगा।

क्या तेजस्वी की लापरवाही से मिला प्रशांत किशोर को मौका?

इस चुनावी परिदृश्य के बाद अब यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या तेजस्वी यादव ने अपनी रणनीतिक चूकों के चलते अनजाने में प्रशांत किशोर को बिहार की मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश करने के लिए एक बड़ा रास्ता खुद ही तैयार करके दे दिया? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में तेजस्वी यादव की राजनीति पारंपरिक तौर-तरीकों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। उन्होंने नए उभरते राजनीतिक विकल्पों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया। दूसरी तरफ, प्रशांत किशोर ने बिहार की जमीन पर लगातार पदयात्राओं का आयोजन किया, सीधे लोगों से जुड़े और तार्किक संवाद के जरिए युवाओं और व्यवस्था से असंतुष्ट मतदाताओं को अपने पाले में करने का एक बड़ा अभियान चलाया।

तेजस्वी यादव और उनके करीबियों द्वारा प्रशांत किशोर को लगातार एक 'गैर-गंभीर' राजनीतिक चेहरा साबित करने की कोशिश की जाती रही। राजद ने उन्हें कभी भी अपने लिए मुख्य चुनौती के रूप में स्वीकार नहीं किया। मुख्य विपक्षी दल की इसी सुस्ती और उदासीनता का पूरा लाभ उठाते हुए प्रशांत किशोर ने राज्य के उस सियासी स्पेस पर अपना मजबूत दावा ठोक दिया है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन से नाराज था लेकिन राजद को भी विकल्प नहीं मान रहा था।

पारंपरिक वोट बैंक में बिखराव और नए विकल्प का उदय

यदि हम बांकीपुर के सामाजिक और राजनैतिक समीकरणों का गहराई से विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस बार मतदाताओं की सोच में एक बड़ा बदलाव आया है। भाजपा के पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं में मौजूदा स्थानीय नेतृत्व को लेकर गहरी नाराजगी देखी जा रही थी। सामान्य परिस्थितियों में, ऐसी नाराजगी का सीधा फायदा मुख्य विपक्षी दल यानी राजद को मिलना चाहिए था। लेकिन इस बार बांकीपुर में पासा पूरी तरह पलट गया।

वोटों का यह बिखराव मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से सामने आया है:

  • मुस्लिम और यादव मतों में बड़ा बिखराव: राजद का सबसे सुरक्षित माना जाने वाला वोट बैंक इस बार पूरी तरह बिखर गया और उनका एक बड़ा हिस्सा जनसुराज की तरफ चला गया।
  • भाजपा के असंतुष्ट मतदाताओं का रुख: भाजपा से नाराज कोर वोटरों ने भी राजद के प्रत्याशी पर भरोसा करने के बजाय प्रशांत किशोर के रूप में एक नए विकल्प को चुनना बेहतर समझा।
  • जातीय गोलबंदी से इतर नया नजरिया: मतदाता अब केवल पारंपरिक जातीय समीकरणों के आधार पर वोट देने के बजाय विकास और बदलाव के नए और तार्किक एजेंडे की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।

बिहार विधानसभा में तेजस्वी के सामने खड़ी होगी बड़ी चुनौती

यदि बांकीपुर के ये शुरुआती रुझान अंतिम नतीजों में तब्दील हो जाते हैं और प्रशांत किशोर बिहार विधानसभा में कदम रखने में सफल होते हैं, तो वे सदन के भीतर निश्चित रूप से तेजस्वी यादव की राजनीति पर बहुत भारी पड़ने वाले हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत उनकी तार्किक क्षमता, आंकड़ों का सही इस्तेमाल और डेटा-आधारित बातें करना है।

जब सदन के पटल पर राज्य के विकास, बेरोजगारी, बदहाल शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के रोजगार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर तार्किक बहस होगी, तो तेजस्वी यादव के लिए प्रशांत किशोर के पैने और धारदार सवालों के सामने टिक पाना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। तेजस्वी यादव अब तक स्वयं को बिहार के युवाओं का एकमात्र और सबसे बड़ा चेहरा होने का दावा करते रहे हैं, लेकिन प्रशांत किशोर की इस धमाकेदार एंट्री से उनका यह एकाधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। कुल मिलाकर, बांकीपुर के इन शुरुआती आंकड़ों ने राजद और तेजस्वी के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका दिया है और बिहार की सियासत को एक नए त्रिकोणीय संघर्ष की ओर धकेल दिया है।

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