अगस्त में बेबी कॉर्न की खेती: महज 60 दिन में डेढ़ लाख तक की कमाई, कम लागत में बनेगा मालामाल

बेबी कॉर्न की खेती किसानों के लिए बेहद मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। वैज्ञानिक सलाह और सही तकनीक अपनाकर किसान सिर्फ 60 दिनों में अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा सकते हैं।

खेती में बदलाव का समय

आधुनिक समय में पारंपरिक खेती से हटकर अब किसान नई नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। यदि आप भी कम समय में अधिक लाभ कमाना चाहते हैं, तो अगस्त का महीना आपके लिए बेहतरीन अवसर लेकर आया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, बेबी कॉर्न की खेती किसानों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है। इसकी खास बात यह है कि यह फसल बहुत कम समय में तैयार हो जाती है और बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है, जिससे किसानों को अपना माल बेचने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता।

कम निवेश और भारी मुनाफा

माधोपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह का मानना है कि जो किसान अब तक केवल धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों पर ही निर्भर थे, उनके लिए बेबी कॉर्न एक शानदार विकल्प है। इसकी खेती में लागत बेहद कम आती है, जबकि मुनाफा उम्मीद से कहीं ज्यादा होता है। एक एकड़ भूमि में खेती करने के लिए मात्र 2 से 3 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। यदि प्रति एकड़ खर्च की बात करें, तो इसमें करीब 20 से 25 हजार रुपए का निवेश आता है। इस निवेश के बदले किसान डेढ़ लाख रुपए से भी ज्यादा का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं।

खेती की प्रक्रिया और उपज

बेबी कॉर्न की खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना गया है। इसके अलावा, सिंचाई की उचित व्यवस्था और थोड़ी देखरेख से आप फसल को सुरक्षित रख सकते हैं। यह फसल बेहद कम अवधि वाली है और बुवाई के महज 60 से 70 दिनों के भीतर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। उपज के आंकड़ों पर गौर करें, तो एक एकड़ जमीन से लगभग 44,000 भुट्टे या फिर 30 से 50 क्विंटल तक का उत्पादन लिया जा सकता है। होटलों, बड़े रेस्तरां और फूड सेंटरों में इसकी निरंतर मांग होने के कारण खरीदार इसे हाथों-हाथ ले लेते हैं, जिससे बाजार की चिंता पूरी तरह खत्म हो जाती है।

कीट और रोग नियंत्रण के उपाय

फसल की बंपर पैदावार सुनिश्चित करने के लिए रोगों से बचाव बेहद जरूरी है। बेबी कॉर्न में मुख्य रूप से तना छेदक, फॉल आर्मीवर्म और पत्ती अंगमारी जैसे रोगों का खतरा बना रहता है। इससे बचने के लिए वैज्ञानिक विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हैं:

  • बीजों की बुवाई से पहले बीजोपचार अनिवार्य रूप से करें।
  • फसल पर कार्बेरिल और इमामेक्टिन बेंजोएट जैसे रसायनों का संतुलित छिड़काव करें।
  • पत्ती अंगमारी से बचाव के लिए बाविस्टिन का उपयोग फायदेमंद रहता है।

इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर किसान न केवल अपनी मेहनत बचा सकते हैं, बल्कि कम समय में ही बेहतर और गुणवत्तापूर्ण फसल तैयार कर आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकते हैं। अगस्त में इसकी बुवाई करना फसल की सेहत के लिए अनुकूल माना जाता है, इसलिए उचित तकनीक के साथ इस खेती को अपनाना फायदेमंद रहेगा।

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