सावन सोमवार: भगवान शिव की स्तुति में गाएं ॐ जय शिव ओंकारा, जानें आरती का महत्व

सावन सोमवार के पावन अवसर पर भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा के बाद आरती करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इस लेख में संपूर्ण आरती और इसके धार्मिक महत्व की विस्तृत जानकारी दी गई है।

सावन सोमवार और शिव पूजा का महत्व

हिंदू धर्म में सावन का महीना और विशेष रूप से सोमवार का दिन भगवान भोलेनाथ की भक्ति के लिए समर्पित है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, सावन सोमवार के दिन शिवजी की पूजा और उन पर जलाभिषेक करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा से भक्त के जीवन के सभी दोष दूर होते हैं और शुभता का संचार होता है। ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं पर गौर करें, तो शिव आरती और ॐ नमः शिवाय मंत्र का निरंतर जाप करने से ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम हो जाते हैं। विशेष रूप से यह पूजा चंद्रमा की शांति और मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने में सहायक मानी जाती है।

आरती का धार्मिक प्रभाव

भगवान शिव की भक्ति में आरती का स्थान सर्वोपरि है। पूजा, मंत्र जाप और अभिषेक की प्रक्रियाओं के बाद जब भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ शिव आरती करते हैं, तो महादेव प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं। आरती समर्पण का एक माध्यम है, जिसके जरिए भक्त अपनी आस्था भगवान के चरणों में अर्पित करता है। यह माना जाता है कि सावन के सोमवार पर जो व्यक्ति नियमित रूप से आरती करता है, उसके घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। साथ ही, यह घर की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर परिवार में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में मदद करती है। शिवजी की कृपा से जीवन की कठिन बाधाएं दूर होती हैं और मन को अद्भुत शांति व आत्मिक संतुष्टि का अनुभव होता है।

शिवजी की संपूर्ण आरती: ॐ जय शिव ओंकारा

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
स्वामी ॐ जय शिव ओंकारा॥

https://hindi.news18.com/news/dharm/shiv-ji-ki-aarti-om-jai-shiv-omkara-jai-shiv-omkara-in-hindi-10711945.html