मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और मधुश्रावणी व्रत
मिथिलांचल की पावन धरती पर नवविवाहित महिलाओं के द्वारा किया जाने वाला मधुश्रावणी व्रत अपनी प्राचीन परंपराओं और अटूट आस्था के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यह व्रत न केवल धार्मिक मान्यताओं से ओतप्रोत है बल्कि यह मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी माना जाता है। हर साल सावन के महीने में आने वाले इस पर्व को महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पूरी निष्ठा के साथ मनाती हैं। इस वर्ष मधुश्रावणी व्रत के लिए विशेष तिथियों का निर्धारण किया गया है, जिसके अनुसार यह पर्व कुल 13 दिनों तक संपन्न होगा।
व्रत की शुरुआत और तिथियां
पूर्णिया के विद्वान पंडित दयानाथ मिश्र द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस वर्ष मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत 3 अगस्त से हो रही है। यह संयोग बहुत शुभ माना जा रहा है क्योंकि इसी दिन सावन की पहली सोमवारी और नाग पंचमी का त्योहार भी पड़ रहा है। नाग पंचमी के दिन ही नवविवाहित महिलाएं पहली बार मधुश्रावणी पूजा के अनुष्ठान में सम्मिलित होंगी। पूजा का यह क्रम निरंतर चलता रहेगा और इसका विधिवत समापन 15 अगस्त को किया जाएगा। पंचांग की गणना के अनुसार इस बार यह व्रत 13 दिनों की अवधि का होगा, जबकि विभिन्न वर्षों में इसकी अवधि तिथियों के फेरबदल के कारण 14 या 15 दिनों की भी हो सकती है। यदि वर्ष में मलमास पड़ता है, तो पूजा की यह अवधि बढ़कर डेढ़ महीने तक भी जा सकती है।
टेमी दागने की रस्म का महत्व
मधुश्रावणी व्रत में सबसे प्रमुख और कठिन रस्म को टेमी दागने की रस्म कहा जाता है। 15 अगस्त को व्रत के अंतिम दिन इस पारंपरिक रस्म को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है। विद्वानों के अनुसार, इस रस्म को मधुश्रावणी व्रत का निस्तार माना जाता है, जिसके बिना यह व्रत अपूर्ण समझा जाता है। नवविवाहित महिलाएं इस दिन विधि-विधान के साथ इस क्रिया को करती हैं, जो उनके अटूट समर्पण और वैवाहिक जीवन के प्रति उनकी गंभीरता का प्रतीक है।
कठोर नियमों का पालन
मधुश्रावणी का व्रत काफी कठिन नियमों के अंतर्गत आता है। पंडित दयानाथ मिश्र ने बताया कि व्रत की पूरी अवधि के दौरान महिलाओं को सात्विक नियमों का कड़ाई से पालन करना पड़ता है। इस दौरान भोजन में विशेष सावधानी बरती जाती है। व्रत रखने वाली महिलाएं पूरे 13 दिनों तक नमक का सेवन नहीं करती हैं। वे पारंपरिक अरवा चावल का भोजन ग्रहण करती हैं और पूर्ण सात्विकता के साथ पूजा-अर्चना में लीन रहती हैं। मिथिलांचल के ब्राह्मण समाज में इस व्रत की परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहरी है। हालांकि, अन्य समुदायों में भी नवविवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए हरितालिका तीज जैसे अन्य महत्वपूर्ण व्रत रखती हैं। हरितालिका तीज का व्रत भी अखंड सौभाग्य की कामना के साथ चतुर्थी के चंद्र दर्शन के दिन या उससे एक दिन पूर्व श्रद्धापूर्वक रखा जाता है। यह सभी व्रत दांपत्य जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने के उद्देश्य से किए जाते हैं, जिन्हें निभाने से वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहने की मान्यता है।
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