बाढ़ से पहले बागवानी बचाने का आसान तरीका: आम और लीची के पेड़ों को ऐसे रखें सुरक्षित

बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में किसानों के लिए अपने बगीचों को बचाना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार कुछ सरल उपाय अपनाकर पेड़ों को सड़ने और सूखने से बचाया जा सकता है।

बाढ़ का खतरा और बागवानी का नुकसान

बिहार के कई जिलों में हर साल बाढ़ की स्थिति पैदा होती है, जिससे न केवल आम जनजीवन बल्कि खेती और बागवानी पर भी गहरा असर पड़ता है। भागलपुर जैसे जिलों में जहां बड़ी तादाद में किसान आम, लीची और अमरूद के बागों पर आश्रित हैं, वहां बाढ़ का पानी एक गंभीर संकट बनकर आता है। जब बगीचों में बाढ़ का पानी लंबे समय तक जमा रहता है, तो सबसे अधिक नुकसान पेड़ों की जड़ों को पहुंचता है। कई बार किसान अपनी आंखों के सामने पेड़ों को सूखते और बर्बाद होते देखते हैं, जिससे उन्हें लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि बाढ़ के आने से पहले थोड़ी सावधानी बरती जाए और कुछ जरूरी तैयारियां कर ली जाएं, तो इन बगीचों को होने वाली भारी क्षति से काफी हद तक बचाया जा सकता है। समय पर की गई यह मेहनत न केवल पेड़ों को जीवनदान देती है, बल्कि आने वाले सीजन में पैदावार को बेहतर बनाने में भी मदद करती है।

जड़ों की सुरक्षा के लिए खास उपाय

बागवानी विशेषज्ञ अशोक चौधरी के अनुसार, बाढ़ संभावित क्षेत्रों के किसानों को आम की फसल की तुड़ाई पूरी होने के तुरंत बाद से ही अपने बगीचों की सुरक्षा को लेकर सतर्क हो जाना चाहिए। पेड़ों को बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए सबसे पहले उनकी जड़ों के चारों ओर हल्की खुदाई करना बहुत आवश्यक है। खुदाई के बाद इसमें नीम की खली, सरसों की खली और कृषि विशेषज्ञ द्वारा अनुशंसित कीटनाशकों का एक मिश्रण तैयार कर डालें। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस विधि के दो प्रमुख लाभ हैं। पहला, यह मिश्रण पेड़ों की जड़ों को मिट्टी में पनपने वाले हानिकारक कीटों और दीमकों से सुरक्षा प्रदान करता है। दूसरा, यह पेड़ों को आवश्यक पोषक तत्व भी प्रदान करता है, जिससे पौधे मजबूत बने रहते हैं। मजबूत जड़ें बाढ़ के पानी में लंबे समय तक नमी झेलने में अधिक सक्षम होती हैं और अगले साल फल उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा में भी सुधार होता है।

पेड़ों के तनों की सुरक्षा और पुताई का महत्व

जड़ों की सुरक्षा के साथ-साथ पेड़ों के तनों को बचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि किसान अतिरिक्त सावधानी के तौर पर पेड़ के तने पर पुताई का कार्य जरूर करें। आमतौर पर, बाढ़ का पानी जहां तक चढ़ने की संभावना होती है, उस ऊंचाई तक पेड़ के तने पर चूना और नील के घोल से पुताई करना काफी असरदार साबित होता है। इस मिश्रण में यदि कोई उपयुक्त कीटनाशक भी मिला दिया जाए, तो इसकी प्रभावशीलता और अधिक बढ़ जाती है।

तनों पर सुरक्षा परत क्यों जरूरी है

अशोक चौधरी ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि कई बार कीट और दीमक जड़ों से ऊपर की ओर बढ़ते हैं और पेड़ के तने को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर देते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए जड़ से लगभग पांच फीट की ऊंचाई तक तने पर पुताई करने से पेड़ को एक सुरक्षा कवच मिल जाता है। इस छोटे से उपाय से पेड़ को अतिरिक्त मजबूती मिलती है और वह बाढ़ के दौरान कीटों के हमले से सुरक्षित रहता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जो किसान बाढ़ आने से पहले ये छोटे और किफायती उपाय अपनाते हैं, उनके बगीचों में पेड़ों के सूखने की दर बहुत कम हो जाती है। अंत में, यह प्रक्रिया किसानों को बड़े नुकसान से बचाकर अगले सीजन में एक बेहतर और सुरक्षित फसल पाने की उम्मीद जगाती है।

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