मार्को रूबियो का बड़ा बयान और अमेरिका की दुविधा
दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक सवाल लगातार चर्चा में रहता है कि क्या अमेरिका और चीन कभी सीधे तौर पर युद्ध के मैदान में आमने-सामने होंगे? हाल ही में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने एक इंटरव्यू के दौरान जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया है, उससे साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका इस तरह की किसी भी संभावना से बेहद चिंतित है। रूबियो ने स्पष्ट रूप से कहा कि भगवान न करे कि कभी अमेरिका और चीन के बीच लड़ाई की नौबत आए, क्योंकि ऐसी स्थिति पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी साबित होगी। उन्होंने कहा कि उनका मुख्य लक्ष्य अमेरिका के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए इस जटिल संबंधों को संभालना है, न कि उसे एक ऐसे मोड़ पर ले जाना जहां से पीछे हटना असंभव हो जाए।
परमाणु हथियारों का जखीरा और आपसी विनाश का डर
अमेरिका और चीन दोनों ही दुनिया के प्रमुख परमाणु संपन्न देश हैं। दोनों के पास परमाणु बमों का इतना बड़ा भंडार है कि यदि युद्ध परमाणु स्तर तक पहुंचता है, तो इसमें हार या जीत जैसी कोई बात नहीं बचेगी। इसे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों द्वारा 'म्यूचुअली एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन' यानी एमएडी कहा जाता है। इसका अर्थ है कि यदि एक पक्ष हमला करता है, तो दूसरा पक्ष भी जवाबी हमले में उतनी ही तबाही मचाएगा कि दोनों राष्ट्र राख हो जाएंगे। परमाणु युद्ध में विजेता का अस्तित्व बचना लगभग असंभव है, और यही डर अमेरिका को चीन के साथ किसी भी बड़े सैन्य टकराव से दूर रहने के लिए मजबूर करता है।
अर्थव्यवस्था का गहरा जाल
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका और चीन एक-दूसरे पर बहुत अधिक निर्भर हैं। अमेरिका के बाजारों में बिकने वाले अधिकांश उपभोक्ता सामान पर 'मेड इन चाइना' का टैग लगा होता है, जो यह दर्शाता है कि आपूर्ति श्रृंखला में चीन की पकड़ कितनी मजबूत है। इसके अतिरिक्त, चीन के पास अमेरिका के खरबों डॉलर के सरकारी बॉन्ड मौजूद हैं। यदि दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के धराशायी होने का जोखिम है। अमेरिका में महंगाई की दर आसमान छू सकती है और आम नागरिकों के लिए सामान्य जीवन जीना भी एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। कोई भी सरकार अपनी अर्थव्यवस्था को खुद नष्ट करना नहीं चाहेगी, और यही कारण है कि व्यापारिक युद्ध को सैन्य युद्ध में बदलना अमेरिका के लिए आत्मघाती कदम होगा।
इतिहास की गलतियों से सबक
अमेरिका का सैन्य इतिहास बताता है कि लंबी और सीधी लड़ाइयों में फंसना उसके लिए हमेशा महंगा साबित हुआ है। वियतनाम युद्ध से लेकर इराक और अफगानिस्तान के अभियानों तक, अमेरिका ने महसूस किया है कि अनिश्चित काल तक चलने वाले युद्ध न केवल उसके खजाने को खाली करते हैं, बल्कि सैनिकों के जीवन का भारी नुकसान भी करते हैं। चीन कोई छोटा देश नहीं है, और उसके साथ होने वाला युद्ध वियतनाम की तुलना में हजार गुना अधिक घातक हो सकता है। पिछली लड़ाइयों के कड़वे अनुभवों ने अमेरिका को यह सिखाया है कि सीधी सैन्य भागीदारी से बचना ही उसके राष्ट्रीय हित में है, क्योंकि इससे देश आंतरिक रूप से कमजोर हो सकता है।
चीन के घर की पिच का फायदा
सैन्य रणनीतिक दृष्टिकोण से चीन को 'होम ग्राउंड' एडवांटेज हासिल है। ताइवान या साउथ चाइना सी जैसे विवादित क्षेत्रों में चीन की सैन्य उपस्थिति बहुत अधिक है। चीन के पास अपनी सरजमीं के करीब मिसाइल बेस, आधुनिक एयरक्राफ्ट और कम दूरी की मारक क्षमता वाले हथियार हैं। इसके विपरीत, अमेरिका को हजारों किलोमीटर दूर से अपनी सेना, एयरक्राफ्ट कैरियर और रसद पहुंचानी होगी। सामरिक रूप से चीन अपने आंगन में बेहद मजबूत है और वहां अमेरिका के लिए टिक पाना और युद्ध जीतना लोहे के चने चबाने जैसा चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।
वैश्विक तबाही का परिदृश्य
आज के दौर में युद्ध का मतलब केवल बंदूकें चलाना नहीं रह गया है। आधुनिक युद्ध साइबर वॉर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरिक्ष तकनीक पर निर्भर हैं। चीन और अमेरिका के बीच सीधी जंग का मतलब पूरी दुनिया का इंटरनेट ठप हो जाना, सैटेलाइट्स का नष्ट हो जाना और ग्लोबल सप्लाई चेन का पूरी तरह बिखर जाना होगा। यूरोप से लेकर एशिया तक का कोई भी देश इस प्रलय से सुरक्षित नहीं बचेगा। आज अमेरिका दुनिया की नंबर वन सैन्य शक्ति बना हुआ है, जिसके पास व्यापक ग्लोबल प्रेजेंस और एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़े हैं, लेकिन चीन की ताकत भी कम नहीं आंकी जा सकती।
चीन की छिपी हुई सैन्य क्षमता
दुनिया ने अभी तक चीन की असली सैन्य ताकत का सीधा परीक्षण किसी युद्ध में नहीं देखा है, जिससे उसका सटीक आंकलन करना मुश्किल है। चीन के पास लगभग 20 लाख सक्रिय सैनिक हैं, जो संख्याबल में अमेरिका से काफी ज्यादा हैं। इसके अलावा, चीन लगातार J-20 जैसे आधुनिक स्टील्थ फाइटर जेट, उन्नत ड्रोन तकनीक और परमाणु जखीरे को बढ़ा रहा है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए अमेरिका का रुख सतर्कता भरा है। अमेरिका चीन को सीधे चुनौती देने के बजाय 'प्रॉक्सी वॉर', ट्रेड वॉर और कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि चीन के साथ सीधी सैन्य भिड़ंत उसकी महाशक्ति वाली स्थिति के अंत की शुरुआत हो सकती है, इसीलिए वह ताइवान जैसे मुद्दों पर सैन्य मदद तो भेजता है, लेकिन सीधे युद्ध में उतरने से पूरी तरह परहेज करता है।
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