सफलता की प्रेरणादायक कहानी: खेती में लौटने के डर ने कैसे एक छात्र को बना दिया बड़ा अफसर

बालोद जिले में पशु चिकित्सा विभाग के उप संचालक डॉ. डीके सिहारे की सफलता की कहानी संघर्ष और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। अंग्रेजी की बाधाओं और कॉलेज में असफलता के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी और आज वे हजारों किसानों की तकदीर बदल रहे हैं।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में पशु चिकित्सा सेवाओं के उप संचालक के पद पर कार्यरत डॉ. डीके सिहारे की कहानी उन सभी युवाओं के लिए एक बड़ा उदाहरण है, जो जीवन में विपरीत परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। उनका सफर यह बताता है कि अगर इरादे बुलंद हों और मेहनत करने का जज्बा हो, तो किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है। उन्होंने न केवल अपनी आर्थिक मुश्किलों को पीछे छोड़ा, बल्कि भाषा की चुनौती को भी अपनी सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।

गांव की पृष्ठभूमि और शुरुआती चुनौतियां

डॉ. डीके सिहारे का जन्म बालोद जिले के गुरुर विकासखंड के गांव चिरचारी में हुआ था। उनका बचपन अभावों में गुजरा। उनके परिवार के पास केवल डेढ़ एकड़ कृषि योग्य जमीन थी और उनके पिता एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में काम करते थे। अपनी शुरुआती पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई उन्होंने अपने गांव के स्कूल से ही पूरी की। इसके बाद, अपनी स्कूली शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने दल्लीराजहरा से अपनी हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी की।

करियर का महत्वपूर्ण मोड़

हायर सेकेंडरी करने के बाद उन्होंने पी एम टी (PMT) परीक्षा की तैयारी शुरू की। हालांकि उन्हें अपने पहले प्रयास में कोई सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दोबारा कोशिश की। उनकी मेहनत रंग लाई और उनका चयन वेटनरी और फॉरेस्ट्री, दोनों ही कोर्स के लिए हो गया। उस समय तक छत्तीसगढ़ राज्य का गठन नहीं हुआ था, इसलिए उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जबलपुर जाना पड़ा। वहां उन्हें एक ऐसी सलाह मिली जिसने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह से बदल दी। वे शुरुआत में फॉरेस्ट्री लेकर रेंजर बनने का सपना देख रहे थे, लेकिन अनुभवी लोगों ने उन्हें वेटनरी क्षेत्र में करियर बनाने की सलाह दी। उन्होंने यह समझाया कि वेटनरी में भविष्य उज्जवल है और रेंजर बनने के लिए आगे भी पी एस सी (PSC) परीक्षा दी जा सकती है।

असफलता से मिली सबसे बड़ी प्रेरणा

कॉलेज का पहला साल उनके लिए बेहद कठिन साबित हुआ। गांव से आने के कारण उनकी अंग्रेजी भाषा पर पकड़ काफी कमजोर थी। इस वजह से वे प्रोफेसरों के लेक्चर को ठीक से समझ नहीं पा रहे थे, जिसका नतीजा यह हुआ कि वे कॉलेज के पहले साल में फेल हो गए। इस असफलता ने उन्हें झकझोर दिया। उनके मन में एक गहरा डर बैठ गया था कि यदि उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई, तो उन्हें वापस अपने गांव लौटकर खेती-किसानी ही करनी पड़ेगी।

लेकिन इसी डर को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। उन्होंने हार मानने के बजाय और अधिक मेहनत करने का निश्चय किया। उन्होंने किताब की हर एक लाइन को गहराई से पढ़ना शुरू किया और लगातार अभ्यास पर ध्यान केंद्रित किया। उनकी यह कड़ी मेहनत रंग लाई और दूसरे वर्ष में उन्होंने शानदार अंकों के साथ परीक्षा पास की। अंततः, उन्होंने अपनी पूरी डिग्री सफलतापूर्वक संपन्न की।

प्रशासनिक सेवाओं में कदम

डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (PSC) की परीक्षा में भाग लिया। अपनी मेहनत और निरंतरता के बल पर उन्होंने पहली ही बार में यह सफलता हासिल कर ली। वर्ष 2000 में उनकी पहली नियुक्ति नारायणपुर में पशु चिकित्सा सहायक के तौर पर हुई। इसके बाद वे 2008 से 2015 तक बालोद जिले में अपनी सेवाएं देते रहे। गरियाबंद में कुछ समय कार्य करने के बाद उनका फिर से बालोद में तबादला हुआ और आज वे वहां उप संचालक के पद पर तैनात होकर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

किसानों के लिए नई राह

डॉ. डीके सिहारे का अब एकमात्र लक्ष्य राज्य के किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त और समृद्ध बनाना है। वे केवल पशु चिकित्सा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे किसानों को खेती के साथ-साथ पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, कुक्कुट पालन और बकरी पालन जैसे अन्य आय के स्रोतों को अपनाने के लिए लगातार प्रेरित कर रहे हैं। उनका मानना है कि खेती और पशुपालन के तालमेल को अपनाकर ही किसान अपनी आर्थिक स्थिति में वास्तविक सुधार ला सकते हैं और आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

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