खेती का आधुनिक और सफल मॉडल
आज के दौर में जब कई युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर रुख कर रहे हैं, छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के एक युवा किसान ललित ने खेती को ही मुनाफे का जरिया बनाकर मिसाल पेश की है। ललित ने अपनी सवा दो एकड़ जमीन को एक प्रयोग भूमि में बदल दिया है, जहां वे पारंपरिक तरीकों से हटकर मिश्रित खेती का उपयोग कर रहे हैं। इस अनूठी पहल के जरिए वे न केवल भविष्य के लिए निवेश कर रहे हैं, बल्कि नकदी फसलों से तुरंत कमाई भी कर रहे हैं।
बागवानी के साथ मिर्च की खेती
ललित ने अपने खेत के एक बड़े हिस्से को फलदार पेड़ों के लिए आरक्षित किया है। उन्होंने लगभग चार साल पहले यहाँ 250 से 300 नाशपाती के पौधे लगाए थे, जिनसे उन्हें अगले साल से फल मिलने की प्रबल उम्मीद है। इसके अलावा, उन्होंने अपने बाग में 20 से 25 अमरूद, 10 से 12 आम और करीब 10 शहतूत के पेड़ भी लगाए हैं। दिलचस्प बात यह है कि अमरूद, आम और शहतूत के पेड़ों में तो फल आना भी शुरू हो गए हैं, जो उनकी मेहनत का पहला परिणाम है।
60 दिन में मिली बड़ी सफलता
ललित ने फलों के पेड़ों के बीच की खाली जमीन को व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्होंने वहां लगभग 8 हजार मिर्च के पौधे लगाए हैं। इस मिर्च की किस्म को विशेष रूप से रायपुर से मंगाया गया था। यह फसल इतनी तेजी से तैयार हुई कि महज 60 दिनों के भीतर ही ललित ने अपनी पूरी लागत वसूल कर ली है। अब तक वे मिर्च बेचकर 30 से 40 हजार रुपये की कमाई कर चुके हैं, जो साबित करता है कि सही योजना के साथ की गई खेती घाटे का सौदा नहीं है।
मिट्टी की तैयारी और आधुनिक तकनीक
इस सफलता के पीछे ललित की तकनीकी सूझबूझ का बड़ा हाथ है। उन्होंने खेत की तैयारी के दौरान जैविक खाद पर खासा जोर दिया है। खेत तैयार करने के लिए उन्होंने करीब 4 ट्रैक्टर गोबर की खाद का उपयोग किया, जिससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनी रहे। खरपतवार को नियंत्रित करने और फसल को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने मल्चिंग तकनीक और देसी नुस्खों का तालमेल बिठाया है।
- खेत की गहराई तक जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाया गया।
- अवांछित पौधों या खरपतवार को हटाकर मेड़बंदी की गई।
- मल्चिंग शीट बिछाकर ड्रिप सिंचाई यानी बूंद-बूंद सिंचाई की आधुनिक प्रणाली लागू की गई।
- मल्चिंग में छेद करके खाद का उपयोग किया गया और फिर पौधों की रोपाई पूरी की गई।
ड्रिप सिंचाई का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि पौधों को उचित मात्रा में पानी मिला, जिससे उनकी जड़ें तेजी से विकसित हुईं और पानी की भी भारी बचत हुई।
लागत और प्रेरणा
ललित के अनुसार, नाशपाती के पौधे उन्हें 12 से 14 रुपये प्रति पौधा की दर से मिले थे। पूरे खेत और बाग को व्यवस्थित करने में कुल 30 से 40 हजार रुपये का शुरुआती खर्च आया था, जो अब मिर्च की फसल से ही वापस आ चुका है। उन्हें इस मॉडल को अपनाने के लिए कृषि विभाग के विशेषज्ञों और अपने परिचितों का मार्गदर्शन मिला, जिसने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया।
युवाओं के लिए एक मिसाल
ललित अब उन युवाओं के लिए एक प्रेरणा बन गए हैं जो खाली जमीन होने के बावजूद उसे उपजाऊ बनाने में झिझकते हैं। उनका मानना है कि यदि किसी के पास पर्याप्त जमीन है, तो मिश्रित खेती सबसे अच्छा विकल्प है। फलदार पेड़ दीर्घकालिक आय देते हैं, जबकि मिर्च जैसी नकदी फसलें किसान की दैनिक और तत्काल जरूरतों को पूरा करती हैं। ललित का संदेश स्पष्ट है कि खेती में नई तकनीक का समावेश करके और विविध फसलों को एक साथ उगाकर कोई भी किसान अपनी आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव ला सकता है।
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