अस्पताल में क्यों मचा हंगामा
बिहार का बेगूसराय सदर अस्पताल एक बार फिर विवादों के घेरे में है। अस्पताल परिसर में उस समय भारी हंगामा खड़ा हो गया जब एक परिवार ने स्वास्थ्यकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए। परिजनों का दावा है कि अस्पताल प्रबंधन ने उनके एक जिंदा बच्चे को बदलकर उसे मृत बच्चा सौंप दिया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अस्पताल में घंटों तक तनावपूर्ण स्थिति बनी रही और देखते ही देखते यह मामला हाई वोल्टेज ड्रामे में बदल गया। स्थिति पर काबू पाने के लिए मौके पर पुलिस बल को बुलाना पड़ा, जिसके हस्तक्षेप के बाद मामला किसी तरह शांत हो सका।
जुड़वां बच्चों के जन्म का पूरा मामला
इस पूरे विवाद की जड़ में जुड़वां बच्चों का जन्म है। जानकारी के अनुसार, लोहियानगर थाना क्षेत्र अंतर्गत आनंदपुर मोहल्ला निवासी आनंद कुमार की पत्नी सुनीता देवी को प्रसव पीड़ा के चलते सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का कहना है कि सुनीता देवी ने दो बच्चों को जन्म दिया, जिनमें एक लड़का और एक लड़की थी। आरोप है कि जन्म के समय दोनों ही बच्चे पूरी तरह स्वस्थ थे। बच्चे की मां सुनीता ने खुद दोनों बच्चों को दो बार दूध भी पिलाया था। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया।
परिजनों के गंभीर आरोप
पीड़ित परिवार का आरोप है कि दोनों बच्चों को एसएनसीयू में भर्ती कराया गया था, जिसके बाद मां को वहां से बाहर निकाल दिया गया। इसके कुछ ही समय बाद, अस्पताल की ओर से परिजनों को एक मृत नवजात थमा दिया गया और आनन-फानन में कागजों पर हस्ताक्षर भी ले लिए गए। अचानक अपने स्वस्थ बच्चे को मृत अवस्था में पाकर परिजन स्तब्ध रह गए और उन्हें बच्चे की अदला-बदली का शक हुआ। परिजनों का कहना है कि उन्होंने अपने सामने अपने बच्चे को जीवित देखा था, फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्हें एक मृत बच्चा थमा दिया गया। उन्होंने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर लापरवाही और बच्चे की चोरी का आरोप लगाया है।
अस्पताल प्रशासन का पक्ष और सफाई
परिजनों के आरोपों के जवाब में अस्पताल प्रशासन ने सफाई दी है। बेगूसराय के सिविल सर्जन डॉ. अशोक कुमार ने साफ तौर पर इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने बताया कि प्रसव के बाद दोनों बच्चों में से एक की स्थिति काफी नाजुक थी, जिसके कारण उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर एसएनसीयू में रखा गया था। डॉक्टर के अनुसार, एक बच्चे की मृत्यु दो दिन पहले ही हो गई थी, जबकि दूसरा बच्चा अभी भी गंभीर अवस्था में वेंटिलेटर सपोर्ट पर ही है। सिविल सर्जन का यह भी कहना है कि मां की मानसिक स्थिति या भ्रम के कारण उन्हें गलतफहमी हुई कि दोनों बच्चे जीवित थे।
सूचना में देरी पर खड़े हुए सवाल
अस्पताल प्रशासन की सफाई के बावजूद भी कई सवाल अनुत्तरित हैं, जिनका जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर बच्चा दो दिन पहले ही मर चुका था, तो परिजनों को इसकी जानकारी तुरंत क्यों नहीं दी गई? क्या कोई प्रक्रियागत चूक हुई है? स्थानीय लोगों और परिजनों का कहना है कि यदि अस्पताल की सूचना व्यवस्था पारदर्शी होती, तो इतना बड़ा बवाल खड़ा नहीं होता। फिलहाल, अस्पताल की कार्यप्रणाली पर आम लोगों के बीच चर्चाएं तेज हैं।
जांच के बाद खुलेगी सच्चाई
वर्तमान में यह पूरा मामला आरोप और प्रत्यारोप के बीच उलझा हुआ है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम इस पूरे प्रकरण की गहराई से पड़ताल कर रही है। संवेदनशील मामला होने के कारण प्रशासन भी बेहद सतर्कता बरत रहा है। यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि परिजनों के आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या वास्तव में अस्पताल प्रबंधन की ओर से कोई बड़ी लापरवाही की गई है। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस घटना ने सदर अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
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