खरीफ सीजन शुरू होते ही किसान खेतों में बुवाई की तैयारियों में जुट गए हैं। इस मौसम में मूंग की फसल किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली दलहनी फसल मानी जाती है। कृषि विशेषज्ञ दिनेश जाखड़ के अनुसार, अगर किसान मूंग की खेती में वैज्ञानिक तौर-तरीके अपनाएं तो उन्हें बेहतर उत्पादन के साथ अच्छी आमदनी भी हासिल हो सकती है। दलहनी फसल होने के कारण मूंग मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाती है।
बुवाई का सही समय और बीज का चयन
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि किसानों को सामान्य रूप से मूंग की बुवाई 15 जुलाई तक पूरी कर लेनी चाहिए। यदि मानसून की बारिश में देरी हो तो कम अवधि में पकने वाली उन्नत किस्मों का चुनाव करना बेहतर रहता है। अच्छी पैदावार के लिए हमेशा प्रमाणित और उपचारित बीजों का ही इस्तेमाल करना चाहिए।
बुवाई हमेशा कतारों में करनी चाहिए, इससे फसल की देखभाल और खरपतवार नियंत्रण आसान हो जाता है। किसानों को कतार से कतार की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे के बीच लगभग 10 सेंटीमीटर का अंतर रखना चाहिए।
नाइट्रोजन की जरूरत कम, संतुलित उर्वरक जरूरी
मूंग दलहनी फसल है, इसलिए इसकी जड़ों में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाली ग्रंथियां बन जाती हैं। यही वजह है कि इसे दूसरी फसलों की तुलना में नाइट्रोजन की कम आवश्यकता पड़ती है। बेहतर उपज के लिए प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम नाइट्रोजन और 40 किलोग्राम फास्फोरस की जरूरत होती है।
बुवाई के समय खेत में प्रति हेक्टेयर 87 किलोग्राम डीएपी और 10 किलोग्राम यूरिया का उपयोग करने से फसल को आवश्यक पोषक तत्व मिल जाते हैं।
राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार का तरीका
मूंग की खेती में बीजोपचार का खास महत्व होता है। फसल की बेहतर वृद्धि और अधिक उत्पादन के लिए बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए। इसके लिए 250 ग्राम गुड़ को एक लीटर पानी में मिलाकर अच्छी तरह गर्म करें। घोल ठंडा होने के बाद इसमें 600 ग्राम राइजोबियम कल्चर मिला दें।
इस मिश्रण से बीजों का उपचार करने के बाद उन्हें छायादार स्थान पर सुखा लें। बीज सूखते ही तुरंत खेत में बुवाई कर देनी चाहिए। ऐसा करने से जड़ों में गांठों का विकास बेहतर होता है और पौधों को प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन मिलती रहती है।
देखभाल और कटाई का सही समय
कृषि विशेषज्ञ दिनेश जाखड़ के मुताबिक, फसल की बढ़वार के दौरान खेत में नमी बनाए रखना, समय-समय पर खरपतवार पर नियंत्रण और कीट-रोगों की निगरानी करना भी जरूरी है। मूंग की फसल 60 से 70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।
जब अधिकांश फलियां काली या भूरे रंग की हो जाएं, तब कटाई कर लेनी चाहिए। सही समय पर कटाई करने से दानों की गुणवत्ता बनी रहती है और उत्पादन में नुकसान नहीं होता। वैज्ञानिक विधि से की गई मूंग की खेती किसानों को बेहतर पैदावार के साथ अधिक मुनाफा दिला सकती है।
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