मध्य प्रदेश में बीते एक महीने से ईंधन की कीमतें लगातार ऊपर चढ़ रही हैं। महंगाई की यह मार घरेलू गैस, पेट्रोल और डीजल तीनों पर एक साथ पड़ रही है। हाल ही में पेट्रोल और डीजल के दामों में चार बार बढ़ोतरी हो चुकी है, जिसका सीधा बोझ आम जनता की जेब पर साफ नजर आ रहा है।
राज्य में सबसे महंगा पेट्रोल कहां?
आमतौर पर लोग मानते हैं कि पेट्रोल भोपाल या इंदौर जैसे बड़े शहरों में सबसे महंगा बिकता होगा, लेकिन हकीकत इससे अलग है। प्रदेश में सबसे महंगा पेट्रोल बालाघाट जिले में मिल रहा है, जहां इसकी औसत कीमत ₹116.11 प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है।
अलग-अलग जिलों के दाम
मध्य प्रदेश के कई जिलों में पेट्रोल का भाव ₹116 के आंकड़े को पार कर गया है। प्रमुख शहरों और जिलों के दाम इस प्रकार हैं:
- बालाघाट: ₹116.11 प्रति लीटर
- मंडला: ₹116.03 प्रति लीटर
- छतरपुर, बड़वानी और बुरहानपुर: ₹116.02 प्रति लीटर
- इंदौर: ₹115.00 प्रति लीटर
- जबलपुर: ₹114.57 प्रति लीटर
- ग्वालियर: ₹114.48 प्रति लीटर
- भोपाल: ₹114.19 प्रति लीटर
बालाघाट में दाम इतने ऊंचे क्यों?
बालाघाट में पेट्रोल का महानगरों से भी महंगा होने की बड़ी वजह इसकी भौगोलिक स्थिति है। यहां काली पुतली चौक स्थित पेट्रोल पंप के मैनेजर के मुताबिक, इस जिले का तेल डिपो जबलपुर में है और बालाघाट उस डिपो से काफी दूर स्थित है। अंतिम छोर पर होने के कारण यहां परिवहन लागत बहुत बढ़ जाती है, और इसी वजह से तेल महंगा बिक रहा है।
कीमत कैसे तय होती है?
पेट्रोल की खुदरा कीमत कई हिस्सों को जोड़कर तय की जाती है। इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लागत, रिफाइनरी का खर्च, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी, राज्य सरकार का वैट और पंप डीलर का कमीशन शामिल होता है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है और देश में हर दिन सुबह 6 बजे नई कीमतें जारी होती हैं।
केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में एक्साइज ड्यूटी में ₹10 की कटौती की थी और फिलहाल पेट्रोल पर ₹3 प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी वसूल रही है। हालांकि राज्य सरकारें अपना वैट तय करने के लिए स्वतंत्र हैं। मध्य प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है, जहां वैट की दरें काफी ऊंची हैं।
आम जनता और किसानों पर असर
बढ़ती कीमतों ने आम लोगों का बजट गड़बड़ा दिया है। 15 मई से पहले बालाघाट में 5 लीटर पेट्रोल ₹540 में मिल जाता था, जिसके लिए अब ₹580 चुकाने पड़ रहे हैं। यही वजह है कि छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग के लोग अब अपनी खपत में कटौती करने लगे हैं।
ग्रामीण इलाकों में गहराती मुश्किल
इस समय खरीफ की खेती का सीजन शुरू हो चुका है, जिसमें खेत की तैयारी और रोपाई के दौरान मशीनों का भारी इस्तेमाल होता है। ट्रैक्टर से जुताई की दर, जो पहले ₹600 प्रति घंटा थी, अब बढ़कर ₹800 तक पहुंच सकती है। इसके अलावा कलेक्टर के आदेश के अनुसार केन यानी डिब्बों में डीजल मिलना बंद हो गया है। अब किसानों को अपने ट्रैक्टर खुद पंप तक ले जाने पड़ रहे हैं, जिससे उनका अतिरिक्त खर्च और परेशानी दोनों बढ़ गए हैं।
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