मेढ़ विधि से तेज आंधी-बारिश में भी सुरक्षित रहेगी मक्के की फसल, कृषि विशेषज्ञ ने बताया कारगर तरीका

मानसून से पहले खेत की सही तैयारी, मेढ़ विधि और उन्नत किस्मों के चयन से किसान भारी बारिश और तेज आंधी में भी मक्के की फसल को गिरने और सड़ने से बचा सकते हैं। देवघर के कृषि विशेषज्ञ ने इसके पूरे तरीके की जानकारी दी है।

खेती-किसानी में मेहनत के साथ-साथ पैसा और समय दोनों लगता है, फिर भी कई बार मौसम की मार किसानों की पूरी फसल चौपट कर देती है। कभी सूखे से फसल मुरझा जाती है तो कभी तेज आंधी-पानी में पौधे खेत में गिरकर बर्बाद हो जाते हैं। ऐसे में मक्के की खेती करने वाले किसानों के लिए एक खास तकनीक बेहद काम की साबित हो सकती है, जिससे भारी बारिश के बीच भी फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है।

झारखंड में मानसून की दस्तक कभी भी हो सकती है और किसान खरीफ फसलों की तैयारी में जुट गए हैं। मक्के की खेती करने वालों के लिए यह समय बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि मानसून के दौरान लगातार और भारी बारिश कई बार फसल को भारी नुकसान पहुंचा देती है। खेत में पानी जमा होने से पौधों में गलन की समस्या शुरू हो जाती है, जड़ें कमजोर पड़ जाती हैं और कई बार पूरी फसल खराब होने की नौबत आ जाती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर शुरू से ही सही तकनीक अपनाई जाए तो मक्के की खेती में मेढ़ विधि किसानों के लिए बेहद लाभकारी साबित हो सकती है।

खेत की तैयारी और मेढ़ विधि क्या है

देवघर के कृषि विशेषज्ञ अंबिका कुशवाहा के अनुसार मक्के की बुआई से पहले खेत की सही तैयारी सबसे जरूरी काम है। सबसे पहले खेत को अच्छी तरह समतल कर लेना चाहिए ताकि कहीं भी अनावश्यक ऊंच-नीच न रह जाए। इसके बाद खेत में सीधी और समान दूरी पर मेढ़ बनानी चाहिए।

उन्होंने बताया कि मेढ़ विधि में फसल को ऊंची पट्टियों यानी मेढ़ों पर लगाया जाता है, जबकि बीच में नालीनुमा जगह छोड़ी जाती है। बारिश होने पर अतिरिक्त पानी इन्हीं नालियों के रास्ते बाहर निकल जाता है और पौधों की जड़ों के पास पानी जमा नहीं होने पाता। इससे फसल में सड़न और गलन जैसी समस्याएं काफी हद तक कम हो जाती हैं।

तेज आंधी में भी नहीं गिरते पौधे

कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि मेढ़ विधि का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इसमें मक्के के पौधे तेज हवा और आंधी में भी आसानी से नहीं गिरते। आमतौर पर मक्के की जड़ें जमीन की ऊपरी सतह के आसपास ही अधिक फैलती हैं, इसलिए तेज हवा चलने पर पौधों के गिरने का खतरा बना रहता है।

जब समय-समय पर मेढ़ की मिट्टी पौधों के तनों के पास चढ़ाई जाती है तो जड़ें और मजबूत हो जाती हैं। इससे पौधे को अतिरिक्त सहारा मिलता है और वह तेज हवा, बारिश तथा आंधी का सामना बेहतर तरीके से कर पाता है। जड़ और तना मजबूत होने से पौधे का विकास भी अच्छा होता है और इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है।

इन उन्नत किस्मों का करें चयन

अंबिका कुशवाहा के मुताबिक अच्छी पैदावार के लिए केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि सही किस्म का चयन भी जरूरी है। किसानों को प्रमाणित और उन्नत किस्मों के बीजों का ही इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने VNR, 4226 और शक्तिवर्धक जैसी उन्नत किस्मों का जिक्र करते हुए बताया कि इनसे बेहतर उत्पादन मिलने की संभावना रहती है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसानों को बीज की गुणवत्ता पर खास ध्यान देना चाहिए, ताकि अंकुरण अच्छा हो और फसल की शुरुआती बढ़वार मजबूत रहे।

खरपतवार नियंत्रण के लिए यह उपाय

मक्के की खेती में खरपतवार भी एक बड़ी समस्या है। खरपतवार फसल के पोषक तत्वों और नमी को अपने उपयोग में ले लेते हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे बचाव के लिए बुआई के बाद उचित समय पर एट्राजीन आधारित खरपतवारनाशी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सही मात्रा में और सही समय पर इसका छिड़काव करने से खेत में खरपतवार का प्रकोप काफी कम हो जाता है। इससे फसल को पर्याप्त पोषण मिलता है और पैदावार बढ़ाने में मदद मिलती है।

कुल मिलाकर अगर किसान मानसून से पहले खेत की अच्छी तैयारी करें, मेढ़ विधि अपनाएं, उन्नत किस्मों का चयन करें और खरपतवार नियंत्रण पर ध्यान दें, तो भारी बारिश के मौसम में भी मक्के की फसल को सुरक्षित रखते हुए बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।

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