फर्जी पासपोर्ट केस: अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को 7 साल की जेल, सीबीआई कोर्ट का बड़ा फैसला

चेन्नई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए पासपोर्ट हासिल करने के मामले में अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को सात साल की सजा सुनाई है।

फर्जीवाड़ा मामले में दोषी करार

कुख्यात अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को एक बार फिर कानूनी शिकंजे का सामना करना पड़ा है। चेन्नई में स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने उसे फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने के मामले में 7 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। सजा के साथ ही अदालत ने उस पर 55 हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया है। छोटा राजन, जिसे विजया कदम, नाना और राजेंद्र जैसे कई नामों से जाना जाता है, पर जालसाजी और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप साबित हुए हैं।

तिहाड़ जेल से हुई पेशी

वर्तमान में छोटा राजन दिल्ली की अति सुरक्षित तिहाड़ जेल में बंद है। वह पहले से ही अन्य आपराधिक मामलों में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। सीबीआई अदालत द्वारा सुनाई गई इस नई सजा के बाद उसके कानूनी संकट में और अधिक इजाफा हो गया है। उसे फर्जी पहचान का इस्तेमाल करके पासपोर्ट बनवाने और अधिकारियों को गुमराह करने का दोषी पाया गया है।

क्या है पासपोर्ट बनवाने का पूरा विवाद?

सीबीआई ने इस मामले की औपचारिक शुरुआत 19 मार्च 2002 को की थी। जांच के दौरान यह बात सामने आई कि छोटा राजन ने चेन्नई स्थित क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को धोखा देकर अपनी पहचान छिपाई और फर्जी कागजात पेश किए। उसने खुद को विजया कदम बताते हुए आवेदन किया था, जिसके लिए उसने स्कूल के ट्रांसफर सर्टिफिकेट, राशन कार्ड और डिमांड ड्राफ्ट जैसे दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था।

जांच में हुआ फर्जीवाड़े का खुलासा

सीबीआई की विस्तृत जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जिस व्यक्ति ने विजया कदम के नाम पर पासपोर्ट हासिल किया था, वह असल में मुंबई निवासी राजेंद्र सदाशिव निखलजे उर्फ नाना उर्फ छोटा राजन ही था। उसने अपनी सही उम्र और पते से जुड़ी जानकारियों को छुपाते हुए जाली दस्तावेज जमा किए और उन्हें वैध बताकर पासपोर्ट हासिल करने में सफलता पा ली थी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, 22 जनवरी 2004 को सीबीआई ने इस मामले में चार्जशीट दायर की थी।

मुंबई अंडरवर्ल्ड का पुराना इतिहास

छोटा राजन का असली नाम राजेंद्र सदाशिव निखलजे है और वह मुंबई के अपराध जगत का एक जाना-माना नाम रहा है। एक समय पर वह दाऊद इब्राहिम का बेहद करीबी सहयोगी हुआ करता था, लेकिन 1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद दोनों के रिश्तों में खटास आ गई और उनके रास्ते अलग हो गए। इसके बाद दोनों के गुटों के बीच वर्षों तक हिंसक गैंगवार जारी रहा। अंततः अक्टूबर 2015 में उसे इंडोनेशिया के बाली से गिरफ्तार किया गया और भारत लाकर तिहाड़ जेल में रखा गया, जहां से अब उसे इस विशेष अदालत के फैसले का सामना करना पड़ा है।

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