बिना बिजली टॉर्च की रोशनी में की पढ़ाई, मजदूर की बेटी बिमला मांझी ने पहले ही प्रयास में NEET पास कर रचा इतिहास

छत्तीसगढ़ के सरगुजा की रहने वाली बिमला मांझी ने अपनी घोर आर्थिक तंगहाली और बुनियादी सुविधाओं की कमी को पीछे छोड़ते हुए पहले ही प्रयास में NEET परीक्षा क्वालिफाई कर ली है। टॉर्च की रोशनी में रात-रात भर पढ़ाई करने वाली बिमला अब डॉक्टर बनकर अपने गांव और समाज की तस्वीर बदलना चाहती हैं।

सपनों की उड़ान किसी जाति, समाज या आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। इसे साबित कर दिखाया है छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की एक होनहार बेटी बिमला मांझी ने। बिमला ने तमाम विपरीत परिस्थितियों, आर्थिक तंगहाली और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझते हुए अपने पहले ही प्रयास में देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET पास कर इतिहास रच दिया है। बिमला एक बेहद पिछड़े समाज से आती हैं, जहां आज भी शिक्षा और विकास की किरणें पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं। ऐसे में उनकी यह सफलता न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे मांझी समाज और क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा का एक बहुत बड़ा स्रोत बन गई है।

संसाधनों की कमी और संघर्षों से भरा शुरुआती सफर

सरगुजा जिले के मैनपाट की रहने वाली बिमला मांझी का बचपन से लेकर हाई स्कूल तक का सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। उनके घर की आर्थिक स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं थी। उनके पिता एक साधारण मजदूर हैं, जो दिन भर कड़ी मेहनत करके परिवार का गुजारा चलाते हैं। आर्थिक तंगहाली के कारण बिमला के पास पढ़ाई के लिए पर्याप्त साधन भी नहीं थे। गांव में बिजली की भारी कटौती रहती थी, विशेष रूप से बारिश और खराब मौसम के दौरान बिजली का न रहना एक आम बात थी। ऐसी विकट परिस्थितियों में भी बिमला ने कभी हिम्मत नहीं हारी। रात के अंधेरे में जब पूरा गांव सो जाता था, तब बिमला हाथ वाली टॉर्च की रोशनी जलाकर घंटों पढ़ाई किया करती थीं। बारिश की बाधाओं के बीच भी उनका ध्यान अपनी किताबों से कभी नहीं भटका।

कलेक्टर बनने का था सपना, लेकिन इस वजह से बदला लक्ष्य

बिमला ने बताया कि बचपन में जब वे अपने गांव और मैनपाट क्षेत्र की बदहाली को देखती थीं, तो उनका सपना एक कलेक्टर बनने का था। वे प्रशासनिक अधिकारी बनकर अपने इलाके की समस्याओं को दूर करना चाहती थीं। हालांकि, उनकी जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें प्रयास आवासीय विद्यालय में प्रवेश मिला। इस विद्यालय में उन्हें उच्च स्तरीय शिक्षा के साथ-साथ करियर के विभिन्न विकल्पों के बारे में जानने का मौका मिला। यहां उन्हें मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी के दो विकल्प मिले। अपने गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं के घोर अभाव और इलाज न मिलने के कारण ग्रामीणों को तड़पते देख बिमला ने फैसला किया कि वे डॉक्टर बनेंगी। उन्होंने मेडिकल क्षेत्र को चुना और पूरी शिद्दत से तैयारी में जुट गईं। उनका लक्ष्य अब MBBS में प्रवेश लेकर एक योग्य डॉक्टर बनना है ताकि वे अपने ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का बेहतर इलाज कर सकें।

जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भी करना पड़ा संघर्ष

बिमला की यह राह इतनी आसान नहीं थी। तैयारी के दौरान उन्हें कदम-कदम पर आर्थिक और सामाजिक बाधाओं का सामना करना पड़ा। घर में आय का एकमात्र साधन उनके पिता की मजदूरी थी, जिसके कारण पढ़ाई के खर्च जुटाने में काफी कठिनाई होती थी। इसके अलावा, बिमला को एक और बड़ी व्यावहारिक परेशानी से गुजरना पड़ा जब उन्हें अपनी परीक्षाओं और दाखिले के लिए बेहद जरूरी दस्तावेज जैसे जाति प्रमाण पत्र बनवाने की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने इस प्रमाण पत्र को बनवाने के लिए गांव के कई लोगों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से मदद मांगी। लेकिन, दुर्भाग्य से किसी ने भी उनकी मदद के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाया। इस उपेक्षा के बावजूद बिमला का हौसला नहीं डगमगाया और उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

माता-पिता और भाई बने बिमला की सबसे बड़ी ताकत

तमाम मुश्किलों के बीच बिमला का परिवार उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ा रहा। बिमला अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता और अपने भाई को देती हैं। उन्होंने बताया कि भले ही घर की माली हालत बेहद खराब थी, लेकिन जब भी उन्हें पढ़ाई के लिए पैसों की जरूरत होती थी, तो उनके माता-पिता किसी न किसी तरह से उन रुपयों का इंतजाम कर देते थे। उनके भाई ने भी हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया और उनकी हर जरूरत को पूरा करने के लिए हमेशा खड़े रहे। परिवार के इस अटूट विश्वास ने बिमला को हर परिस्थिति से लड़ने की शक्ति दी।

पहले ही प्रयास में NEET क्वालिफाई कर समाज को दिया संदेश

बिमला ने एक ही साथ दोहरी जिम्मेदारी निभाई। उन्हें एक तरफ अपनी कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी करनी थी और दूसरी तरफ NEET की कठिन परीक्षा का सामना करना था। दोनों परीक्षाओं की तैयारी एक साथ करने की वजह से उनके पास समय की काफी कमी रहती थी। इसके बावजूद उन्होंने समय का बेहतरीन प्रबंधन किया और अपने पहले ही प्रयास में NEET की परीक्षा क्वालिफाई कर ली। इस शानदार सफलता के बाद बिमला ने समाज के युवाओं और बच्चों को एक खास संदेश दिया है। उनका कहना है:

"अगर इंसान के भीतर कुछ कर गुजरने की लगन, कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प हो, और उसे अपने परिवार का पूरा सहयोग मिले, तो दुनिया की कोई भी कठिनाई या आर्थिक तंगी उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। समाज या गांव का कोई भी बच्चा अपने सपनों को पूरा कर सकता है, बस उसे लगातार मेहनत करते रहना चाहिए।"

https://hindi.news18.com/news/career/jobs-bimla-manjhi-neet-cracks-neet-despite-financial-challenges-inspiration-for-tribal-community-local18-10699244.html