114 राफेल जेट खरीद की राह में 3 रोड़े, भारत की बात मानने को तैयार नहीं फ्रांस, क्या अटक जाएगी ₹3.25 लाख करोड़ की डिफेंस डील?

भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल लड़ाकू विमानों की ₹3.25 लाख करोड़ की विशाल डील तकनीकी मतभेदों के कारण फंसी हुई है। भारत और फ्रांस के बीच रडार तकनीक, सोर्स कोड और इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है।

भारत और फ्रांस के बीच रक्षा संबंधों की नई परीक्षा

भारत और फ्रांस के बीच दशकों पुराने रक्षा संबंध रहे हैं, जिसकी बदौलत नई दिल्ली और पेरिस के बीच अब तक के सबसे बड़े रक्षा सौदे की नींव रखी गई है। भारतीय वायुसेना के बेड़े में 114 राफेल लड़ाकू विमानों को शामिल करने की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है। हालांकि कई बुनियादी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं, लेकिन अभी भी तीन ऐसी बड़ी बाधाएं हैं, जिनके कारण यह ₹3.25 लाख करोड़ की विशाल डील निर्णायक दौर में पहुंचकर अटक गई है। दोनों देशों के बीच इन मुद्दों पर निरंतर बातचीत जारी है, लेकिन फ्रांस की ओर से अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिल सका है।

भारतीय वायुसेना की ज़रूरत और बदलता वैश्विक परिदृश्य

दुनिया की सबसे शक्तिशाली वायुसेनाओं में शुमार भारतीय वायुसेना के लिए इन विमानों की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। पाकिस्तान और चीन जैसे दो पड़ोसी देशों के साथ सीमाओं पर लगातार तनाव के कारण भारत के लिए अपनी सेना के तीनों अंगों—थल सेना, वायुसेना और नौसेना—को अत्याधुनिक बनाना अनिवार्य हो गया है। इतिहास में इन देशों के साथ भारत कई युद्ध लड़ चुका है, जिससे सबक लेते हुए भारत अपनी सीमा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। 21वीं सदी के आधुनिक युद्धक्षेत्र में केवल टैंक और मिसाइल काफी नहीं हैं, बल्कि ड्रोन और लड़ाकू विमानों की भूमिका निर्णायक हो गई है। वैश्विक पटल पर आज भी उसी देश का दबदबा है, जिसके पास सबसे उन्नत लड़ाकू विमान मौजूद हैं। अमेरिका, रूस और अब चीन के साथ भारत के जटिल सुरक्षा समीकरणों को देखते हुए, नई दिल्ली के लिए यह आवश्यक है कि वह दो मोर्चों पर एक साथ लड़ने में सक्षम रहे।

स्क्वाड्रन की कमी और भारत की रणनीति

भारतीय वायुसेना के लिए सरकार ने 42 स्क्वाड्रन की स्वीकृति दी हुई है, लेकिन वर्तमान में यह संख्या घटकर केवल 29 रह गई है, जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक चिंताजनक स्थिति है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत दोतरफा नीति अपना रहा है। पहली रणनीति विदेशों से लड़ाकू विमानों का आयात करना है, और दूसरी रणनीति 'स्वदेशी तकनीक' के जरिए खुद के लड़ाकू विमानों का निर्माण करना है। इसी उद्देश्य के साथ, भारत ने फ्रांस से 114 राफेल विमान खरीदने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया है। योजना के अनुसार, इन विमानों का निर्माण नागपुर में डसॉल्ट एविएशन के साझा संयंत्र में किया जाएगा, जिसमें 60 प्रतिशत से अधिक स्वदेशीकरण का लक्ष्य रखा गया है।

डील को रोकने वाले 3 बड़े तकनीकी रोड़े

114 राफेल विमानों की खरीद में जो तीन मुख्य तकनीकी मुद्दे सामने आए हैं, वे भारत की आत्मनिर्भरता और ऑपरेशनल आजादी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इन मुद्दों पर फ्रांस और भारत के बीच अब तक कोई आम सहमति नहीं बन पाई है।

  • एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) रडार: राफेल में लगे RBE2-AA रडार की बौद्धिक संपदा यानी आईपीआर (IPR) फ्रांसीसी कंपनी थेल्स (Thales) के पास है। डसॉल्ट एविएशन का कहना है कि रडार में किसी भी प्रकार का बदलाव करने का अधिकार उनके पास नहीं है, क्योंकि इसका स्वामित्व थेल्स के पास है। यह भारत की भविष्य की स्वदेशी तकनीक जोड़ने की योजना में सबसे बड़ी रुकावट है।
  • सोर्स कोड शेयरिंग: यह सबसे संवेदनशील मुद्दा है। राफेल का सोर्स कोड ही उसके मिशन कंप्यूटर, सेंसर फ्यूजन और हथियार प्रबंधन प्रणाली को नियंत्रित करता है। फ्रांस इसे अपनी गोपनीय रक्षा तकनीक मानकर साझा करने से बच रहा है। यदि भारत को यह कोड नहीं मिलता है, तो उसे भविष्य में अस्त्र बीवीआर (BVR) मिसाइल या रुद्रम जैसी स्वदेशी मिसाइलों के एकीकरण के लिए हमेशा फ्रांस पर निर्भर रहना पड़ेगा।
  • इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट (ICD): भारत सरकार वर्तमान में आईसीडी तक पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर दे रही है। यह वह तकनीकी दस्तावेज है जो विमान के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के बीच के संचार और प्रोटोकॉल की जानकारी देता है। बिना आईसीडी के, भारत अपने खुद के हथियारों को राफेल के साथ सुरक्षित रूप से एकीकृत नहीं कर पाएगा।

सुखोई-30 मॉडल से मिली प्रेरणा

भारत सरकार चाहती है कि इस डील में भी वही मॉडल अपनाया जाए जो उसने रूसी लड़ाकू विमान सुखोई-30 एमकेआई (Su-30MKI) के मामले में किया था। रूस से तकनीकी जानकारी हासिल करने के बाद भारतीय इंजीनियरों ने विमान में सफलतापूर्वक संशोधन किया था और उसमें ब्रह्मोस मिसाइल को इंटीग्रेट किया था। भारत का मानना है कि यदि फ्रांस आईसीडी तक पहुंच देता है, तो भारत डीआरडीओ के माध्यम से अपने स्वयं के हार्डवेयर विकसित कर सकेगा और भविष्य में फ्रांसीसी कंपनियों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

भविष्य की राह और आत्मनिर्भरता

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने अनुभवों, जैसे कि मिराज-2000 अपग्रेड कार्यक्रम, से भारत ने सीखा है कि तकनीकी पहुंच न होने से परियोजनाओं की लागत भी बढ़ती है और समय भी अधिक लगता है। भारत अब 'वेंडर लॉक-इन' से बचना चाहता है। भविष्य में यदि भारत अपने स्वदेशी 'उत्तम' रडार को राफेल में लगाना चाहता है, तो इसके लिए फ्रांसीसी प्रणालियों के साथ गहन समन्वय की आवश्यकता होगी। यह सौदा केवल विमान खरीदने का नहीं है, बल्कि यह भविष्य के स्वदेशी कार्यक्रमों जैसे तेजस एमके-2 (Tejas MK-2) और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के लिए एक तकनीकी आधार तैयार करने का अवसर भी है। यदि भारत इन प्रणालियों पर नियंत्रण हासिल कर लेता है, तो नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता में भारत को एक बड़ी बढ़त हासिल होगी। फिलहाल, गेंद पूरी तरह से फ्रांस के पाले में है और देखना यह है कि क्या वे भारत की 'आत्मनिर्भरता' की मांग को स्वीकार करते हैं या यह ऐतिहासिक डील और लंबी खिंचती है।

https://hindi.news18.com/news/defence/india-france-114-rafale-fighter-deal-3-mega-hurdle-radar-intellectual-property-right-source-code-interface-control-document-10692502.html