कारगिल के रण में साथ लड़े थे जुड़वां भाई
पूरा देश जब कारगिल विजय दिवस के गौरवशाली पलों को याद कर रहा है, तब मुजफ्फरपुर के बेला निवासी दो जुड़वां भाइयों की कहानी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। रामेश्वर सिंह और भरत प्रसाद सिंह, जिन्हें स्थानीय स्तर पर कमांडो ब्रदर्स के नाम से पहचाना जाता है, ने कारगिल युद्ध की अपनी स्मृतियों को ताजा किया है। इन दोनों भाइयों का सफर न केवल सेना में एक साथ भर्ती होने से शुरू हुआ, बल्कि वे कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर भी कंधे से कंधा मिलाकर दुश्मनों के खिलाफ लड़ते रहे।
सेना में भर्ती और कारगिल का मोर्चा
रामेश्वर सिंह ने बताया कि उन्होंने और उनके भाई भरत प्रसाद सिंह ने साल 1996 में भारतीय सेना में प्रवेश किया था। कारगिल युद्ध के दौरान, रामेश्वर सिंह 9 पैरा कमांडो में लांस नायक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उन्होंने अपनी सेवा जारी रखी और अंततः दिसंबर 2012 में हवलदार के पद से सेवानिवृत्त हुए। वहीं, उनके भाई भरत प्रसाद सिंह का करियर भी उतना ही गौरवशाली रहा। वे द गार्ड्स रेजिमेंट की 14वीं बटालियन में गरुड़ कमांडो के रूप में तैनात थे और जुलाई 2012 में सेना से सेवानिवृत्त हुए।
मौत को करीब से देखने का अनुभव
भरत प्रसाद सिंह ने युद्ध के भयावह दृश्यों को याद करते हुए बताया कि प्रशिक्षण के कुछ ही समय बाद कारगिल संघर्ष छिड़ गया था। उस समय युवा जोश और देश के लिए मर-मिटने की ललक रगों में दौड़ रही थी। भरत ने बताया कि पाकिस्तानी दुश्मन ऊंची पहाड़ियों पर बैठकर भारतीय सेना की रसद और हथियारों की आपूर्ति पर लगातार गोलाबारी कर रहे थे। स्थिति इतनी विकट थी कि कई बार यह सोचना पड़ता था कि क्या अब घर वापसी हो पाएगी या नहीं। आंखों के सामने साथियों को वीरगति को प्राप्त होते देखना बहुत कठिन था, लेकिन देश सेवा के संकल्प ने हार नहीं मानने दी। भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों की मदद से निरंतर मिल रहे गोला-बारूद और भोजन ने सैनिकों का मनोबल ऊंचा बनाए रखा। शुरुआती दौर में रणनीतिक कठिनाइयों के बावजूद भारतीय सेना ने अपनी कमर कसी और अंततः विजय प्राप्त की।
बचपन का सपना और सैन्य सम्मान
कमांडो ब्रदर्स के लिए सेना में जाना केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक सपना था। उनकी मां के दादाजी अक्सर भविष्यवाणी करते थे कि ये दोनों जुड़वां भाई देश की सेवा करेंगे, जो आगे चलकर सच साबित हुआ। भरत प्रसाद सिंह ने अपने करियर का एक और महत्वपूर्ण किस्सा साझा किया। साल 2008 में आतंकवाद विरोधी एक बड़े अभियान के दौरान, उनकी 21 सदस्यीय टीम को 100 आतंकवादियों को ढेर करने का लक्ष्य दिया गया था। अद्भुत साहस दिखाते हुए उनकी टीम ने महज 90 दिनों के भीतर इस मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इस वीरता के लिए उन्हें उत्तरी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग द्वारा प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया। हालांकि, इस दौरान वे गंभीर रूप से घायल भी हुए। दुश्मन द्वारा बिछाए गए एक ID बम के विस्फोट में उनकी आंखों में गंभीर चोट आई थी, जिसके लिए उन्हें बाद में विदेश जाकर इलाज करवाना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि अपने संपूर्ण सैन्य जीवन के दौरान उनकी टीम ने लगभग 250 आतंकियों का सफाया किया था। दोनों भाई आज भी गर्व के साथ कहते हैं कि देश की सेवा से बढ़कर दुनिया में कोई धर्म नहीं है।
https://hindi.news18.com/news/bihar/muzaffarpur-kargil-vijay-diwas-muzaffarpurs-commando-brothers-narrate-their-war-stories-local18-ws-l-10692443.html