शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
धर्मेंद्र प्रधान ने औपचारिक रूप से केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया है। उनके इस अप्रत्याशित निर्णय ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। धर्मेंद्र प्रधान को भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक संरचना में एक बेहद सक्षम और भरोसेमंद रणनीतिकार के तौर पर देखा जाता है, जिन्होंने पार्टी के लिए मुश्किल माने जाने वाले राज्यों में चुनाव प्रबंधन की कमान कुशलता से संभाली है। शिक्षा मंत्री के रूप में उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को धरातल पर उतारने की थी। हालांकि, हालिया समय में नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने की घटनाओं के बाद देशभर में छात्रों और अन्य वर्गों द्वारा किए गए तीखे विरोध ने स्थितियां बदल दीं। अंततः उन्हें अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को भेजना पड़ा, जिसे सरकार के शुरुआती उदासीन रवैये के बाद एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
विवादों के बीच इस्तीफा देने वाले दूसरे मंत्री
जून के महीने में धर्मेंद्र प्रधान ने कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए उसे दहशतगर्दों की बी-टीम करार दिया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह पार्टी उन ताकतों के लिए काम कर रही है जिन्हें जनता ने पहले ही नकार दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले कार्यकाल में किसी सार्वजनिक विवाद के चलते इस्तीफा देने वाले वे दूसरे केंद्रीय मंत्री हैं। उनसे पहले वर्ष 2018 में मी टू आंदोलन के दौरान यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करने पर एम.जे. अकबर ने विदेश राज्य मंत्री के पद से त्यागपत्र दिया था। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो धर्मेंद्र प्रधान विवादों के बाद इस्तीफा देने वाले देश के दूसरे शिक्षा मंत्री बन गए हैं। उनसे पूर्व वर्ष 1967 में एम.सी. छागला ने नीतिगत और राजनीतिक मतभेदों के चलते इंदिरा गांधी कैबिनेट से इस्तीफा दिया था।
ABVP से शुरू हुआ सियासी सफर
धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक करियर वर्ष 1983 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) के एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में शुरू हुआ था। तीन बार केंद्रीय मंत्री रहने वाले 57 वर्षीय प्रधान, पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रधान के पुत्र हैं। वे पिछले कुछ वर्षों से बिहार और हरियाणा जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में पार्टी के चुनाव प्रभारी की भूमिका निभाने के लिए भाजपा नेतृत्व की पहली पसंद बने रहे हैं।
चुनावी राज्यों में निभा चुके हैं निर्णायक भूमिका
धर्मेंद्र प्रधान ने वर्ष 2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव और वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली थी। उनका सबसे बड़ा लक्ष्य उनका अपना गृह राज्य ओडिशा रहा है, जहां वर्ष 2024 में भाजपा ने पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने में सफलता हासिल की। वर्ष 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उन्हें नंदीग्राम सीट का कार्यभार सौंपा गया था। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उसी सीट से चुनाव लड़ रही थीं, और राज्य में पार्टी की व्यापक जीत के बावजूद वे खुद नंदीग्राम में चुनाव हार गई थीं।
वर्ष 2000 में चुनावी राजनीति में प्रवेश
अपने चुनावी सफर की शुरुआत उन्होंने वर्ष 2000 में ओडिशा की पल्लाहारा सीट से की। इसके बाद 2004 में उन्होंने देवगढ़ लोकसभा सीट से किस्मत आजमाई, जहां से पहले उनके पिता देवेंद्र प्रधान सांसद रह चुके थे। वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति से कुछ समय के लिए किनारा कर लिया था। हालांकि, उनकी संगठनात्मक कुशलता को देखते हुए उन्हें 2010 में भाजपा का महासचिव नियुक्त किया गया। फिर वर्ष 2012 में वे बिहार से राज्यसभा के लिए चुने गए। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी सत्ता में आए, तो उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी दी गई।
उज्ज्वला मैन की पहचान और मंत्री के रूप में सेवा
गरीब परिवारों तक मुफ्त एलपीजी कनेक्शन पहुंचाने वाली महत्वाकांक्षी उज्ज्वला योजना को सफलतापूर्वक लागू करने के कारण उन्हें देश भर में उज्ज्वला मैन के नाम से जाना गया। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में वे सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मंत्री रहे। वर्ष 2017 में मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया और साथ ही कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी दी गई। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भी उन्हें कैबिनेट मंत्री के रूप में पेट्रोलियम मंत्रालय संभाले रखा। वर्ष 2021 में उन्हें केंद्रीय शिक्षा मंत्री के साथ कौशल विकास मंत्री बनाया गया, जहाँ उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने का चुनौतीपूर्ण कार्य संभाला।
संबलपुर से वापसी और भविष्य की राह
धर्मेंद्र प्रधान ने वर्ष 2024 में ओडिशा की संबलपुर लोकसभा सीट से विजय हासिल कर पूरे 15 साल बाद सदन में वापसी की। उन्होंने बीजू जनता दल (BJD) के प्रणब प्रकाश दास को 1.19 लाख से अधिक वोटों से हराया। 2024 में मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में उन्हें फिर से शिक्षा मंत्रालय की बागडोर मिली, लेकिन यह शुरुआत पेपर लीक विवादों से घिरी रही। ओडिशा के तालचेर निवासी धर्मेंद्र प्रधान ने भुवनेश्वर के उत्कल विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है। ओडिशा विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत और 78 सीटों पर सफलता के बाद उन्हें राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदारों में गिना जा रहा था।
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