सीजेपी की सफलता और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
राजनीति की बिसात पर एक ऐसा दौर आया है जिसने सबको हैरान कर दिया है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने जब यह कहा कि 'झुकती है दुनिया, बस झुकाने वाला चाहिए', तो यह मात्र एक बयान नहीं था, बल्कि एक हकीकत थी। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी हकीकत का प्रमाण है। नीट-यूजी परीक्षा में पेपर लीक और धांधली के खिलाफ छात्रों का गुस्सा सड़कों पर उबल रहा था, और अंततः शनिवार को सरकार को दबाव में आकर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करना पड़ा। यह केवल एक मंत्री का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसी पार्टी की ऐतिहासिक जीत है जिसे अस्तित्व में आए अभी मात्र दो महीने ही हुए हैं। 12 वर्षों के अंतराल में विपक्ष जिस काम को करने में पूरी तरह नाकाम रहा, उसे एक मीम से शुरू हुए आंदोलन ने संभव कर दिखाया। अभिजीत दिपके के शब्दों में, यदि आप सरकार से भयभीत नहीं हैं, तो किसी का भी इस्तीफा लिया जा सकता है। यह घटनाक्रम देश की बदलती राजनीतिक दिशा की ओर संकेत करता है और मुख्यधारा के विपक्षी दलों के लिए एक कड़ा संदेश भी है।
इतिहास के पन्नों में इस्तीफों का परिदृश्य
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के महत्व को समझने के लिए हमें बीते वर्षों के राजनीतिक इतिहास को खंगालना होगा। ललित मोदी विवाद के दौरान राजनाथ सिंह का वह प्रसिद्ध बयान आज भी याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'यह यूपीए नहीं एनडीए है, यहां मंत्री इस्तीफा नहीं देते।' 2004 से 2014 के बीच यूपीए शासनकाल में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के कारण कई मंत्रियों को कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। लेकिन 2014 के बाद से परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। पिछले 12 वर्षों में अनेक विवाद हुए, बड़े विरोध प्रदर्शन देखे गए, लेकिन कोई भी आंदोलन इतना प्रभावी नहीं रहा जो किसी मंत्री का इस्तीफा सुनिश्चित कर सके।
मोदी कैबिनेट में इस्तीफों की वास्तविकता
वर्ष 2014 के बाद के समय में केंद्रीय मंत्रियों को कैबिनेट से हटाया तो गया है, लेकिन इसके पीछे कभी भी किसी जन आंदोलन का दबाव नहीं रहा। कोविड संकट के दौरान वर्ष 2021 में स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का हटना एक बड़ा बदलाव था, लेकिन वह एक संगठित कैबिनेट फेरबदल का हिस्सा था, न कि किसी सड़क पर हुए विरोध का परिणाम। उस दौरान 12 मंत्रियों ने एक साथ पद छोड़े थे, जिसमें रविशंकर प्रसाद और प्रकाश जावड़ेकर जैसे नाम भी शामिल थे। इन इस्तीफों में कहीं भी पब्लिक प्रोटेस्ट की भूमिका नहीं थी। इस दृष्टि से अभिजीत दिपके और उनके आंदोलन की उपलब्धि अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने असंभव प्रतीत होने वाले लक्ष्य को हासिल किया है।
सोनम वांगचुक और जंतर-मंतर की भूमिका
इस आंदोलन की कहानी में सोनम वांगचुक की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यद्यपि छात्रों को एकजुट करने का श्रेय अभिजीत दिपके को जाता है, लेकिन क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की 26 दिनों की भूख हड़ताल ने आंदोलन को एक नई दिशा दी। जब सरकार आंदोलनकारियों की सुध नहीं ले रही थी, तब वांगचुक का जंतर-मंतर पहुंचना गेम-चेंजर साबित हुआ। उनके हाथ में मौजूद गुलाब का फूल और उनका शांत सत्याग्रह आंदोलन का मुख्य आकर्षण बन गया। वांगचुक की हंगर स्ट्राइक ने मीडिया और देश की जनता का ध्यान इस मुद्दे पर केंद्रित रखा। हालांकि, अनशन समाप्त होने के दौरान अस्पताल में दो बड़े केंद्रीय मंत्रियों की उपस्थिति ने कुछ विवादों और डील की अटकलों को जन्म दिया, क्योंकि वहां सीजेपी का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। इन अफवाहों के बावजूद, वांगचुक ने वीडियो संदेश के माध्यम से अपनी स्थिति स्पष्ट की और अपनी आलोचनाओं का उत्तर दिया। अंततः, उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र की जीत करार दिया।
कॉकरोच जनता पार्टी की अनूठी शुरुआत
सीजेपी के जन्म के पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है। इस वर्ष 15 मई को चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि कुछ बेरोजगार युवा सोशल मीडिया का सहारा लेकर सबको टारगेट करना शुरू कर देते हैं। इस बयान के बाद 16 मई को अभिजीत दिपके ने कॉकरोच जनता पार्टी का गठन कर दिया। आम आदमी पार्टी के पूर्व कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट रहे दिपके ने इसे एक सटायर यानी व्यंग्यात्मक आंदोलन का नाम दिया। 'आलसी और बेरोजगारों की आवाज' के नारे के साथ शुरू हुई इस वेबसाइट का मुख्य उद्देश्य उन युवाओं को प्लेटफॉर्म देना था जो सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। नीट-यूजी पेपर लीक के बाद यह व्यंग्यात्मक आंदोलन एक गंभीर जन आंदोलन में बदल गया और दिपके ने जंतर-मंतर पर पहुंचकर इसे नेतृत्व प्रदान किया। 25 जुलाई को मिली सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि ऑनलाइन फॉलोइंग को ऑफलाइन ताकत में बदलना संभव है।
विपक्ष के लिए क्या है कड़ा संदेश
छात्रों के इस सफल आंदोलन में विपक्षी पार्टियों के लिए कड़ा संदेश छिपा है। जब विरोध प्रदर्शन चल रहा था, तब कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने इसे भुनाने और हाईजैक करने की हर संभव कोशिश की। वे चाहते थे कि यह विरोध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दहलीज तक पहुंचे। संसद के मानसून सत्र के दौरान विपक्षी नेता प्रदर्शनकारियों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए आतुर दिखे। लेकिन यह आंदोलन एक कड़वा सच सामने ले आया है। किसान आंदोलन के बाद यह दूसरा ऐसा सफल आंदोलन है जिसे उन स्टेकहोल्डर्स ने खुद लीड किया जो सीधे प्रभावित थे। विपक्षी दलों को इस आंदोलन में हाशिये पर रहने को मजबूर होना पड़ा। आज जब विपक्ष युवाओं की पीठ थपथपा रहा है, तब उन्हें आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है कि आखिर युवा उनके पीछे क्यों नहीं खड़े होते? क्या युवा अब समझ चुके हैं कि अपनी लड़ाई खुद लड़ना ही अधिक प्रभावी है? धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा यह स्पष्ट करता है कि अब देश का युवा अपने भविष्य से खिलवाड़ को बर्दाश्त नहीं करेगा और बिना किसी राजनीतिक बैनर के भी बड़ी जीत दर्ज कर सकता है। शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और व्यापक सुधार की मांग ही इस आंदोलन का असली आधार है, जिस पर अब ध्यान केंद्रित करने का समय आ गया है।
https://hindi.news18.com/news/nation/opinion-dharmendra-pradhan-resigns-neet-ug-protest-cjp-abhijeet-dipke-opposition-rahul-gandhi-10689561.html