कारगिल विजय का सैन्य ढांचा
जब भी कारगिल युद्ध का जिक्र होता है, तो आंखों के सामने टाइगर हिल और टोलोलिंग जैसी दुर्गम पहाड़ियों की चोटियों पर तिरंगा फहराते वीर जवानों की तस्वीर उभर आती है। हालांकि, यह गौरवपूर्ण जीत केवल पैदल सेना (इन्फैंट्री) के अदम्य साहस का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह भारतीय सेना की विभिन्न इकाइयों के बीच बने अभूतपूर्व समन्वय और अथक परिश्रम की कहानी है। जनरल वी. पी. मलिक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Kargil: From Surprise to Victory में इसे स्पष्ट किया है कि कारगिल केवल हथियारों की जंग नहीं थी, बल्कि यह तकनीकी दक्षता, रसद प्रबंधन, संचार की मजबूती और चिकित्सा व्यवस्था की एक कठिन परीक्षा थी। ऑपरेशन विजय को सफल बनाने के लिए हर कॉर्प्स ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
तोपखाना: दुश्मन के छक्के छुड़ाने वाली शक्ति
जनरल वी. पी. मलिक के अनुसार, पहाड़ी युद्ध में पैदल सेना भले ही मुख्य भूमिका निभाती है, लेकिन उसे सुरक्षा और आक्रामक बल तोपखाने (Artillery) से ही मिलता है। ऑपरेशन विजय में सेना ने लगभग 50 फायर यूनिट्स को तैनात किया था, जिनमें 155 मिमी बोफोर्स हॉवित्जर, 130 मिमी मीडियम गन, फील्ड गन, मोर्टार और रॉकेट बैटरी शामिल थी। इस युद्ध में कुल 90 दिनों के भीतर सेना ने लगभग 2.5 लाख गोले और रॉकेट दागे। तोपखाने की मीडियम गनों ने कुल गोला-बारूद का करीब 30 प्रतिशत इस्तेमाल किया। टाइगर हिल और प्वाइंट 4875 जैसे ठिकानों पर तोपखाने ने केवल 5 मिनट के अंतराल में 1,200 से अधिक हाई-एक्सप्लोसिव गोले बरसाकर दुश्मन की कमर तोड़ दी। यही नहीं, 122 मिमी ग्रैड मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर का उपयोग प्रत्यक्ष फायरिंग के लिए किया गया, जिसने 17 किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन के ठिकानों को भी नेस्तनाबूद कर दिया। अग्रिम मोर्चों पर मौजूद फॉरवर्ड ऑब्जर्वेशन ऑफिसर्स ने न केवल दिशा-निर्देश दिए, बल्कि कई बार कंपनी कमांडर के घायल होने पर खुद कमान संभालकर जीत सुनिश्चित की।
आर्मी एविएशन कॉर्प्स: दुर्गम चोटियों की जीवनरेखा
कारगिल की गगनचुंबी पहाड़ियों पर जहां पैदल चलना या सड़क मार्ग से पहुंचना नामुमकिन था, वहां आर्मी एविएशन कॉर्प्स ने सेना की जीवनरेखा के रूप में कार्य किया। इन जांबाज पायलटों ने दो स्क्वाड्रनों के जरिए कुल 2,500 से अधिक मिशन पूरे किए और 2,700 घंटे से ज्यादा की उड़ान भरी। यह उड़ानें हेलीकॉप्टरों की अधिकतम क्षमता वाली ऊंचाई पर की गई थीं। शुरुआती चरणों में इन हेलीकॉप्टरों ने 240 सैनिकों और लगभग 200 टन सैन्य सामग्री को उन ऊंचाइयों तक पहुंचाया जहां पहुंचना कठिन था। चिकित्सा सहायता के क्षेत्र में इनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही, जहां 900 से अधिक घायलों को युद्ध क्षेत्र से बाहर निकाला गया। विशेष रूप से चीता हेलीकॉप्टरों ने 734 मिशन पूरे करके 785 घायल जवानों को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाया।
कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स: पहाड़ों को जीतने का रास्ता
इंजीनियर कोर का काम केवल निर्माण करना नहीं था, बल्कि युद्ध की गति को नियंत्रित करना था। युद्ध के दौरान 12 इंजीनियर रेजिमेंट तैनात थीं, जिन्होंने 8 किलोमीटर क्लास-9 सड़क, 250 किलोमीटर खच्चर मार्ग, 20 किलोमीटर पैदल रास्ते और लगभग 70 हेलिपैड तैयार किए। इसके साथ ही, पाकिस्तानी सेना द्वारा छोड़ी गई करीब 5,000 बारूदी सुरंगों और बूबी ट्रैप को बिना किसी निशान के खोजना और उन्हें हाथों से हटाना उनके अदम्य साहस और पेशेवर कौशल का प्रमाण था।
कॉर्प्स ऑफ सिग्नल्स: संवाद की निरंतरता
कारगिल के कठिन पहाड़ी इलाकों में संचार व्यवस्था को बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। उस समय तकनीक के सीमित साधनों के बावजूद सिग्नल्स कोर ने संचार को बाधित नहीं होने दिया। उन्होंने सामान्य वायरलेस सेटों के अलावा इरिडियम सैटेलाइट फोन, इनमारसैट सैटेलाइट टर्मिनल और बटालियन स्तर तक फैक्स जैसी सुविधाओं को सुनिश्चित किया। इन्हीं साधनों के कारण मुख्यालय से लेकर अग्रिम चौकियों और तोपखाने के बीच तालमेल बना रहा।
आर्मी सर्विस कॉर्प्स: रसद की अटूट आपूर्ति
ऊंचाई पर स्थित मोर्चों तक राशन और गोला-बारूद पहुंचाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। शुरुआत में 5,000 टन गोला-बारूद की भारी मांग को पूरा करने के लिए आर्मी सर्विस कॉर्प्स ने दिन-रात काम किया। जहां वाहनों का पहुंचना असंभव था, वहां एनिमल ट्रांसपोर्ट बटालियन ने रसद पहुंचाई। वहीं मैकेनिकल ट्रांसपोर्ट बटालियन ने दुश्मन की गोलाबारी के बीच भी गोला-बारूद और ईंधन की आपूर्ति को कभी नहीं रुकने दिया।
आर्मी मेडिकल कॉर्प्स: मौत के जबड़े से जीवन तक
युद्ध के दौरान आर्मी मेडिकल कॉर्प्स ने मानवता की मिसाल पेश की। कुल 1,361 घायल सैनिकों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिनमें से केवल 14 की जान गई, जो प्रतिकूल मौसम और चोटों की गंभीरता को देखते हुए एक असाधारण मेडिकल उपलब्धि थी। कैप्टन सोमनाथ बसु जैसे डॉक्टरों ने स्वयं घायल होने के बावजूद हर दिन 15 से अधिक ऑपरेशन किए, ताकि हर एक जवान की जान बचाई जा सके।
आर्मी ऑर्डनेंस कॉर्प्स: हथियारों का भंडार
जैसे ही युद्ध की मांग बढ़ी, ऑर्डनेंस कॉर्प्स ने 300 से अधिक तोपों, मोर्टारों और रॉकेट लॉन्चरों की जरूरतों को पूरा किया। देशभर के डिपो से सैन्य सामग्री जुटाने के लिए 100 से अधिक विशेष रेलगाड़ियां चलाई गईं, जो गोला-बारूद को जम्मू तक पहुंचाती रहीं।
इलेक्ट्रिकल एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (EME): तकनीकी तत्परता
EME की जिम्मेदारी हथियारों को हर हाल में चालू रखना था। उन्होंने युद्ध के दौरान 650 से ज्यादा वाहनों को रिकवर किया, 200 इंजन बदले और 5,000 से अधिक मरम्मत कार्य सीधे युद्धक्षेत्र में ही पूरे किए। हेलीकॉप्टरों के स्पेयर पार्ट्स समय पर पहुंचाकर उन्होंने वायु सेवा को भी लगातार चालू रखा।
निष्कर्ष
कारगिल युद्ध ने साबित कर दिया कि एक आधुनिक सैन्य अभियान केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि एक समन्वित प्रयास से जीता जाता है। मिलिट्री पुलिस, पोस्टल सर्विस और अन्य सहयोगी इकाइयों के बिना भी ऑपरेशन विजय की सफलता संभव नहीं थी। जनरल वी. पी. मलिक के शब्दों में, हर कॉर्प्स ने अपनी भूमिका को पूरी निष्ठा के साथ निभाकर भारत को यह ऐतिहासिक जीत दिलाई।
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