पश्चिम एशिया में गहराता संकट
पश्चिम एशिया का तनाव अब एक नई और खतरनाक दिशा में आगे बढ़ गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनातनी के बीच, अब बाब-अल-मंदेब और लाल सागर का क्षेत्र भी युद्ध की लपटों में घिरता नजर आ रहा है। हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए जाने का दावा किया है। हालांकि, सऊदी अरब ने अभी तक केवल एक जहाज पर हमले की पुष्टि की है, लेकिन इस घटना ने पूरी दुनिया की समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
हमले की पूरी जानकारी
यमन के हूती विद्रोही संगठन ने आधिकारिक तौर पर दावा किया है कि उसने लाल सागर में सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों, जिनके नाम Encelia और Layla बताए गए हैं, को निशाना बनाया है। विद्रोही संगठन का कहना है कि इन दोनों जहाजों पर एक साथ क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन का इस्तेमाल करके हमला किया गया, जिससे जहाजों में भीषण आग लग गई।
दूसरी ओर, सऊदी अरब की सरकारी समाचार एजेंसी SPA ने केवल Encelia जहाज पर हमले की पुष्टि की है। एजेंसी के मुताबिक, हमले के कारण जहाज के अगले हिस्से में आग लग गई थी, लेकिन राहत की बात यह है कि जहाज के सभी चालक दल के सदस्य पूरी तरह सुरक्षित हैं। सऊदी प्रशासन का कहना है कि जहाज को सुरक्षित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
ऊर्जा सुरक्षा पर वैश्विक खतरा
दुनिया की तेल और ऊर्जा आपूर्ति अब एक साथ दो बड़े समुद्री मोर्चों पर खतरे की जद में है। एक तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान और अमेरिका के बीच टकराव के चलते तनाव चरम पर है, वहीं दूसरी ओर लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में हूतियों का हमला एक नई चुनौती बन गया है। बाब-अल-मंदेब वह महत्वपूर्ण और संकरा रास्ता है जो अरब सागर से जुड़ी अदन की खाड़ी को लाल सागर से जोड़ता है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है, तो इसका सीधा असर केवल पश्चिम एशिया तक ही सीमित नहीं रहेगा। इससे एशिया, यूरोप और पूरी दुनिया में तेल की कीमतों और शिपिंग लागत में भारी बढ़ोतरी होना निश्चित है।
सहमति के बावजूद क्यों बढ़ा तनाव
विश्लेषकों का मानना है कि 2022 में सऊदी अरब और हूतियों के बीच हुए एक रोडमैप समझौते के बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। सना के पत्रकार हुसैन अल-बुखैती के अनुसार, इस समझौते के बाद भी होदेदा बंदरगाह पर जहाजों के सामान्य संचालन की अनुमति नहीं दी गई। दावा किया गया है कि यमन के तेल और गैस से प्राप्त होने वाली कमाई भी हूती नियंत्रित क्षेत्रों तक नहीं पहुंची, जिससे वहां के निवासियों पर आर्थिक दबाव बढ़ता गया। यमन की लगभग 70 प्रतिशत आबादी हूतियों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में रहती है, जिसके कारण संगठन पर लगातार जवाबी कार्रवाई करने का दबाव बना रहता है।
पाकिस्तान के लिए खड़ी हुई दुविधा
इस हमले ने सबसे ज्यादा बेचैनी पाकिस्तान के भीतर पैदा कर दी है। हूतियों के इस कृत्य के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने सऊदी अरब के समर्थन में एक कड़ा बयान जारी किया है। मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि सऊदी अरब और लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों को धमकाना न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता और वैश्विक व्यापार के लिए भी बहुत बड़ा खतरा है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब की संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है।
पाकिस्तान की यह घबराहट स्वाभाविक है, क्योंकि पिछले साल ही पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ था। इस समझौते की शर्तों के अनुसार, यदि सऊदी अरब पर कोई सैन्य हमला होता है, तो ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को सक्रिय रूप से युद्ध में शामिल होना पड़ सकता है।
क्या पाकिस्तान युद्ध में कूदेगा
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि हूतियों के हमले इसी तरह जारी रहते हैं, तो पाकिस्तान की अगली रणनीति क्या होगी? क्या पाकिस्तान केवल कूटनीतिक विरोध दर्ज कराकर चुप बैठ जाएगा, या फिर उसे सैन्य कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा? यदि पाकिस्तान किसी भी तरह की प्रत्यक्ष कार्रवाई का रास्ता चुनता है, तो वह अनजाने में ही उस यमन संघर्ष में फंस सकता है, जिससे उसने अब तक खुद को दूर रखने की भरसक कोशिश की है।
इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान के भीतर भी इस मुद्दे पर आम राय नहीं है। सऊदी अरब उसका एक बेहद करीबी रणनीतिक साझेदार और आर्थिक सहयोगी जरूर है, लेकिन यमन के मानवीय संकट और धार्मिक-राजनीतिक समीकरणों को लेकर देश का एक वर्ग अलग दृष्टिकोण रखता है। ऐसी स्थिति में, हूतियों के खिलाफ किसी भी सैन्य कदम का समर्थन वहां के हर तबके से मिलना कठिन है।
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