जहानाबाद की मार्मिक दास्तां: बाढ़ ने छीने माता-पिता, 6 बच्चों के कंधों पर बिखरे परिवार का बोझ

बिहार के जहानाबाद में एक परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है कि छह बच्चों के सिर से माता-पिता का साया पूरी तरह उठ चुका है। अब बड़ी बहन ईंट ढोकर और मजदूरी कर छोटे भाई-बहनों का पेट भरने को मजबूर है।

जिंदगी के कठिन इम्तिहान से गुजर रहे 6 अनाथ बच्चे

बिहार के जहानाबाद जिले से एक अत्यंत विचलित कर देने वाली खबर सामने आई है। यहां के मखदुमपुर प्रखंड के नौगढ़ गांव में रहने वाले एक परिवार पर मुसीबतों का ऐसा दौर आया है कि जिसने भी सुना, वह स्तब्ध रह गया। महज दो साल के अंतराल में इस परिवार के छह बच्चों ने अपने माता और पिता दोनों को खो दिया है। अब इन पांच बेटियों और एक बेटे के सामने जीवन जीने का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है। माता-पिता के गुजर जाने के बाद इन मासूमों की देखरेख और भरण-पोषण कौन करेगा, यह सवाल पूरे गांव और इलाके के लोगों को झकझोर रहा है।

पिता का निधन और मां की अंतिम विदाई

इस दुखद परिवार के मुखिया स्व. शक्लदेव मांझी थे। करीब 2 साल पहले, शक्लदेव मांझी अपनी दवा लेने के लिए बाजार निकले थे। इसी दौरान अचानक नदी का जलस्तर बढ़ गया और वे बाढ़ के पानी की चपेट में आ गए। पानी के तेज बहाव में बह जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उस हादसे ने परिवार की कमर तोड़ दी थी। हालांकि, मां ने जैसे-तैसे अपने छह बच्चों को संभालने की हिम्मत जुटाई, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। पिता की मौत के बाद मां भी गंभीर बीमारी की चपेट में आ गईं और 14 दिन पहले वे भी जिंदगी की जंग हार गईं। मां के निधन के साथ ही इन छह बच्चों के सिर से माता-पिता का साया पूरी तरह से उठ गया है।

कर्ज में डूबा अंतिम संस्कार

परिवार की माली हालत इतनी खराब है कि मां के अंतिम संस्कार के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। घर में कोई बड़ा कमाने वाला सदस्य नहीं होने के कारण, बड़ी बहन कोसमी देवी ने साहसी कदम उठाते हुए 20 हजार रुपए का कर्ज लिया। उसी राशि से मां का श्राद्ध कर्म संपन्न किया गया। अब जबकि श्राद्ध कर्म की रस्में पूरी हो चुकी हैं, तो परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे उस कर्ज को कैसे चुकाएंगे और आने वाले दिनों में घर का चूल्हा कैसे जलेगा।

गरीबी और बीमारी के बीच पल रहे बच्चे

वर्तमान स्थिति यह है कि घर में बड़ी बहन कोसमी देवी ही अकेली हैं जो ईंट ढोने और खेतों में धान की रोपाई जैसे कठिन शारीरिक श्रम करके परिवार का पेट पालने की कोशिश कर रही हैं। घर में शिक्षा का अभाव है और बच्चे अभी काफी छोटे हैं। इतना ही नहीं, परिवार के लिए दुख की एक और परत यह है कि दो बच्चों को गंभीर बीमारी ने जकड़ रखा है। उनके इलाज के लिए पैसे की सख्त जरूरत है, जिसे जुटा पाना बड़ी बहन के लिए किसी असंभव कार्य से कम नहीं है। गरीबी का आलम यह है कि जिस दिन घर का कोई सदस्य मेहनत-मजदूरी कर पाता है, उसी दिन चूल्हा जलता है, वरना कई बार उन्हें भूखा भी रहना पड़ता है।

प्रशासनिक मदद और खोखले वादे

इस परिवार की दयनीय स्थिति देखकर कुछ लोग मदद के लिए आगे जरूर आए, लेकिन उनमें से कई सिर्फ दिखावे और फोटो खिंचवाने तक सीमित रहे। वास्तविक धरातल पर जो प्रशासनिक सहायता 2 साल पहले मिल जानी चाहिए थी, वह बेहद देरी से मिली। बीते बुधवार को प्रशासन ने पिता के निधन के मुआवजे के तौर पर 4 लाख रुपए का चेक बड़ी बहन कोसमी देवी को सौंपा। हालांकि यह राशि वर्तमान संकट में थोड़ी राहत जरूर दे सकती है, लेकिन भविष्य की लंबी लड़ाई के लिए यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

कोसमी देवी की गुहार

अपनी आपबीती सुनाते हुए कोसमी देवी कहती हैं, 'हमारे माता और पिता दोनों हमें छोड़कर चले गए हैं। अब घर में इन 5 भाई-बहनों की जिम्मेदारी पूरी तरह मेरे कंधों पर है। हम जिस गरीबी में जी रहे हैं, वह किसी से छिपी नहीं है। कई लोग आए, खानापूर्ति की और चले गए। हमें उम्मीद है कि जिला प्रशासन हमारी स्थिति पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगा और कुछ ऐसा सहयोग प्रदान करेगा, जिससे हम भी सामान्य बच्चों की तरह अपनी जिंदगी गुजार सकें।'

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