हिमाचल प्रदेश में कुदरत का रौद्र रूप: बोह घाटी में बादल फटने से 25 घर तबाह, 200 लोग बेघर

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले की बोह घाटी में बादल फटने से भारी तबाही हुई है, जिसमें 25 मकान पूरी तरह जमींदोज हो गए हैं और करीब 200 लोग बेघर हो गए हैं। प्रशासन और सेना राहत कार्यों में जुटे हैं और प्रभावितों के पुनर्वास के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

कांगड़ा की बोह घाटी में कुदरत की बड़ी मार

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के शाहपुर स्थित बोह घाटी के गढ़गूंन और स्पैड़ा गांवों में कुदरत का भीषण कहर बरपा है। यहां बादल फटने की घटना के बाद बड़े पैमाने पर तबाही का मंजर देखने को मिला है। इस प्राकृतिक आपदा के कारण इलाके के 25 मकान पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं, जबकि कई अन्य घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। हालांकि, स्थानीय प्रशासन और निवासियों की तत्परता और सतर्कता के कारण जान-माल की बड़ी क्षति टल गई, लेकिन बड़ी संख्या में लोग बेघर हो गए हैं। जिला उपायुक्त हेमराज बैरवा ने मौके का जायजा लिया और राहत एवं पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जिन परिवारों ने अपने आशियाने खो दिए हैं, उन्हें हर हाल में सरकारी भूमि पर बसाया जाएगा।

38 परिवार और 200 लोगों पर संकट

उपायुक्त हेमराज बैरवा द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस आपदा से कुल 38 परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, जिनकी आबादी लगभग 200 लोगों की है। नुकसान का आकलन करें तो गढ़गूंन गांव में 12 परिवारों के घर पूरी तरह से बह गए, जबकि स्पैड़ा गांव में 13 मकानों का नामोनिशान मिट गया। इसके अतिरिक्त, 9 मकानों को आंशिक नुकसान पहुंचा है और 12 अन्य घर अभी भी खतरे की चपेट में हैं। तबाही के दौरान मलबे में कई गौशालाएं भी दब गई हैं, जिससे पशुधन को भारी नुकसान हुआ है। प्रभावित परिवारों का घर के भीतर रखा कीमती सामान, जरूरी दस्तावेज, राशन और कपड़े तक मलबे में दबकर नष्ट हो गए हैं।

राहत शिविर और पुनर्वास की व्यवस्था

सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने दोनों प्रभावित गांवों को खाली करवा दिया है। बेघर हुए लोगों को स्थानीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में बनाए गए राहत शिविर में शिफ्ट किया गया है, जबकि कुछ लोग अपने रिश्तेदारों के यहां शरण लिए हुए हैं। प्रशासन की ओर से इन लोगों को बर्तन, कपड़े, भोजन और दैनिक जरूरत का सामान उपलब्ध कराया जा रहा है। मुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री ने भी पीड़ितों को हर संभव सरकारी सहायता का आश्वासन दिया है। उपायुक्त के अनुसार, जिन परिवारों के पास रहने के लिए कोई जगह नहीं बची है, उनके पुनर्वास के लिए सरकारी भूमि चिह्नित कर ली गई है और प्रक्रिया पूरी होते ही उन्हें जमीन आवंटित कर दी जाएगी।

बढ़ी फौरी राहत राशि

आपदा की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने प्रभावितों के लिए फौरी राहत राशि में भी बढ़ोतरी की है। पहले जहां पूर्ण रूप से तबाह हुए घरों के लिए 15 हजार रुपये की सहायता राशि दी जाती थी, उसे अब बढ़ाकर 50 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक कर दिया गया है। यह राशि सीधे तौर पर प्रभावित परिवारों को वितरित की जा रही है ताकि वे अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकें। उपायुक्त ने समाज के दानदाताओं और सामाजिक संस्थाओं से अपील की है कि वे प्रशासन के दिशा-निर्देशों और जरूरत की सूची के अनुसार ही मदद भेजें, ताकि सही वस्तुएं सही समय पर जरूरतमंदों तक पहुंच सकें।

सड़क संपर्क की चुनौती और सेना की भूमिका

राहत कार्यों के दौरान सबसे बड़ी बाधा सड़क संपर्क का टूट जाना है। हालांकि पंचायत मुख्यालय तक रास्ता बहाल कर दिया गया है, लेकिन स्पैड़ा गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को 10 से 15 मिनट और गढ़गूंन तक 20 से 25 मिनट तक पैदल चलना पड़ रहा है। भारी मशीनरी के मौके पर न पहुंच पाने के कारण राहत कार्यों में काफी दिक्कत आ रही है, और मलबे को हाथों से हटाना पड़ रहा है। प्रशासन ने सेना से मदद की गुहार लगाई थी, जिसके बाद सेना की टीम ने मोर्चा संभाल लिया है। सेना के जवान मलबे के नीचे दबे हुए सामान को सुरक्षित निकालने में ग्रामीणों की मदद कर रहे हैं।

पहाड़ी पर लटकी चट्टानें बनी नया खतरा

राहत कार्य अभी चल ही रहे हैं कि एक और नया खतरा सामने आया है। स्पैड़ा गांव के ऊपर पहाड़ी के ऊपरी हिस्से में दो से तीन विशाल चट्टानें अभी भी ढीली और अस्थिर स्थिति में हैं, जो कभी भी नीचे गिर सकती हैं। प्रशासन की तकनीकी टीम ने इन चट्टानों का बारीकी से निरीक्षण किया है। अधिकारियों का कहना है कि मौसम के पूरी तरह साफ होने के बाद नियंत्रित ब्लास्टिंग या मैनुअल चिपिंग के जरिए इन चट्टानों को सुरक्षित तरीके से हटाया जाएगा, ताकि भविष्य में दोबारा किसी बड़े हादसे की आशंका न रहे। प्रशासन का मुख्य लक्ष्य इन प्रभावित परिवारों को वापस सामान्य जीवन की ओर ले जाना है और सीएम सुक्खू के जल्द ही प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने की उम्मीद है।

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