लालटेन की लौ से कुलपति की कुर्सी तक: प्रो. नरेंद्र कुमार शुक्ल की प्रेरणादायी यात्रा, जिस संस्थान से पढ़ाई उसी में संभाले बड़े पद

जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया के नवनियुक्त कुलपति प्रोफेसर नरेंद्र कुमार शुक्ल ने गांव में लालटेन और ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई कर विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद तक का सफर तय किया। उनकी कहानी मेहनत और सकारात्मक सोच की मिसाल है।

जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया के नवनियुक्त कुलपति प्रोफेसर नरेंद्र कुमार शुक्ल का जीवन आज की युवा पीढ़ी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है। बेहद सीमित संसाधनों के बीच शुरुआत करने वाले प्रो. शुक्ल ने विश्वविद्यालय के सबसे ऊंचे पद तक पहुंचकर यह दिखा दिया कि कड़ी मेहनत, अटूट लगन और सकारात्मक दृष्टिकोण के बल पर हर लक्ष्य पाया जा सकता है।

कानपुर में बीता बचपन, पिता से मिली प्रेरणा

लोकल 18 से बातचीत में प्रो. नरेंद्र कुमार शुक्ल ने बताया कि उनका बचपन कानपुर में गुजरा। उनके पिता एक डिग्री कॉलेज में शिक्षक थे और उन्हीं से उन्हें शिक्षा तथा अनुशासन की सीख मिली। प्राथमिक स्तर से लेकर इंटरमीडिएट और बीएससी तक की पूरी पढ़ाई उन्होंने कानपुर में ही की।

इसके बाद वर्ष 1983 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। यहीं से उन्होंने बीटेक (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग), एमटेक (इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग) और ऑप्टिकल कम्युनिकेशन विषय में पीएचडी की उपाधि अर्जित की।

जहां से पढ़ाई, वहीं संभाले अहम दायित्व

दिलचस्प बात यह रही कि जिस विश्वविद्यालय से उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की, अध्यापन की शुरुआत का अवसर भी उन्हें वहीं मिला। उन्होंने प्रवक्ता, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दीं।

इसके साथ ही प्रॉक्टर, डीन कॉलेज डेवलपमेंट, कुलसचिव, विभागाध्यक्ष और वित्त अधिकारी जैसे कई प्रशासनिक दायित्वों का भी उन्होंने सफलतापूर्वक निर्वहन किया।

जीवन का सबसे गौरवपूर्ण क्षण

प्रो. शुक्ल ने बताया कि विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य करते समय उन्हें राज्यपाल द्वारा जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया का कुलपति नियुक्त किए जाने की सूचना मिली। यह उनके जीवन का सबसे यादगार और गौरवपूर्ण पल था।

उन्होंने कहा कि हर प्रोफेसर का सपना विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद तक पहुंचने का होता है और यह उपलब्धि उन्हें कठिन परिश्रम और बड़ों के आशीर्वाद से प्राप्त हुई।

लालटेन और ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई

युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि असफलता से घबराने के बजाय उससे सबक लेना चाहिए और पढ़ाई के दौरान कभी हताश नहीं होना चाहिए। छात्रावास जीवन की कठिनाइयों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि कई बार भोजन तक की समस्या खड़ी हो जाती थी, फिर भी पढ़ाई के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ। वह प्रतिदिन नियमित रूप से चार घंटे एकाग्र होकर अध्ययन किया करते थे।

उन्होंने बताया कि गांव में उन्होंने लालटेन और ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई की है। उस दौर में संसाधनों की भारी कमी थी और पुस्तकालयों में किताबों के लिए होड़ लगी रहती थी।

आज तकनीक और डिजिटल संसाधनों के इस युग में छात्रों के पास सफलता के कहीं अधिक अवसर हैं। यदि युवा सकारात्मक सोच, लगातार प्रयास और मेहनत को अपना मंत्र बना लें, तो वे जीवन में किसी भी ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं।

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