पीडिया कला का नया अध्याय
भोजपुर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर में शुमार पीडिया कला के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रही इस पारंपरिक कला को अब आधिकारिक तौर पर जीआई (GI) टैग मिल गया है। यह प्रमाणन न केवल इस कला की मौलिकता पर मुहर लगाता है, बल्कि इसे वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस टैग के मिलने से उन शिल्पकारों में नई उम्मीद की किरण जगी है, जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी मेहनत और हुनर के दम पर इस कला को आज भी जीवंत रखा है।
कला को मिलेगी बाजार की संजीवनी
जीआई टैग मिलना किसी भी पारंपरिक उत्पाद या कला के लिए एक गौरवपूर्ण क्षण होता है, क्योंकि यह उसके क्षेत्रीय महत्व को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। कला विशेषज्ञ और भोजपुरी संस्कृति के संरक्षक संजीव सिन्हा के अनुसार, अब तक पीडिया कला से जुड़े कलाकार अपनी कृतियों को प्रदर्शित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उन्हें न तो बाजार में उचित पहचान मिल पा रही थी और न ही उनके श्रम के अनुपात में आर्थिक लाभ हो रहा था। अब इस टैग के माध्यम से पीडिया कला को व्यवस्थित बाजार से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त होगा। कलाकार अब अपनी विशिष्ट कलाकृतियों को स्थानीय स्तर से आगे ले जाकर देश के विभिन्न हिस्सों में बिक्री के लिए उपलब्ध करा सकेंगे।
रोजगार के नए अवसरों का द्वार
इस विकास का सबसे सकारात्मक प्रभाव कलाकारों की आजीविका पर पड़ने की उम्मीद है। जब किसी वस्तु को जीआई टैग मिलता है, तो उसकी प्रामाणिकता को लेकर उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ता है, जिससे उसकी मांग में इजाफा होता है। मांग बढ़ने का सीधा लाभ सीधे तौर पर कलाकारों को मिलेगा, जिससे उनकी आय में वृद्धि होना तय है। इसके अलावा, इस कला से जुड़े लोगों के लिए काम के नए अवसर पैदा होंगे, जिससे वे अपने परिवार का भरण-पोषण अधिक सम्मानजनक ढंग से कर सकेंगे। संजीव सिन्हा का मानना है कि सम्मान और धन का समावेश ही इस कला को युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनाएगा, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी इसे सीखने के लिए प्रेरित होंगी।
संरक्षण और भविष्य की चुनौतियां
पीडिया कला के संरक्षण को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ टैग मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है। इस पहचान का वास्तविक लाभ अंतिम छोर पर बैठे कलाकार तक पहुंचे, इसके लिए सरकार और विभिन्न संस्थाओं की सक्रिय भूमिका अनिवार्य है। केवल प्रमाण पत्र मिलने से स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि कलाकारों को निम्नलिखित स्तरों पर समर्थन की आवश्यकता है:
- कलाकारों को आधुनिक डिजाइन और तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाए ताकि उत्पाद बाजार की मांग के अनुरूप बन सकें।
- विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में इन कलाकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए मंच उपलब्ध कराया जाए।
- आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों को सरकारी योजनाओं के जरिए सहायता मिले ताकि वे कच्चा माल आसानी से जुटा सकें।
- पीडिया कला के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं ताकि आम जनता इसके महत्व को समझ सके।
कुल मिलाकर, पीडिया कला को मिला यह जीआई टैग भोजपुरी संस्कृति के लिए एक संजीवनी की तरह है। यह न केवल इस कला के संरक्षण का आधार बनेगा, बल्कि कलाकारों की कला को पहचान और सम्मान दिलाने के साथ-साथ उनके भविष्य को भी सुरक्षित करेगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारी तंत्र किस प्रकार इन कलाकारों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ता है, ताकि पीडिया कला की यह चमक देश-दुनिया में बरकरार रहे।
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