छत्तीसगढ़ के स्वाद का जादू
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक रसोई अपनी अनूठी पहचान के लिए पूरे भारत में मशहूर है। यहां का खानपान न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि उसमें स्थानीय उपलब्ध सामग्री का बेहतरीन उपयोग भी देखने को मिलता है। इन्ही पारंपरिक व्यंजनों की लंबी फेहरिस्त में एक नाम है 'ईढर'। यह डिश अरबी के पत्तों, जिन्हें स्थानीय भाषा में कोचई पान कहा जाता है, और उड़द की दाल के मेल से तैयार की जाती है। विशेष रूप से बरसात के मौसम में, जब अरबी के पत्ते ताजे और प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, तब छत्तीसगढ़ के अधिकांश घरों में ईढर का स्वाद चखने को जरूर मिलता है।
सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा
स्थानीय गृहिणी अन्नू नायक के अनुसार, ईढर केवल एक सब्जी नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। यह व्यंजन न केवल बड़े अवसरों पर मेहमानों के लिए बनाया जाता है, बल्कि सामान्य दिनों में भी इसे बड़े उत्साह के साथ रसोई में तैयार किया जाता है। अन्नू नायक का मानना है कि यदि इसे पूरी विधि और धैर्य के साथ बनाया जाए, तो इसका स्वाद लाजवाब होता है और जो भी इसे एक बार चख लेता है, वह इसकी रेसिपी जरूर पूछता है।
दाल तैयार करने की विधि
ईढर बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत उड़द दाल से होती है। सबसे पहले अच्छी गुणवत्ता वाली उड़द दाल को पानी में डालकर करीब 4 से 6 घंटे तक भिगोया जाता है। जब दाल पूरी तरह से भीग जाए, तो उसे अच्छी तरह धोकर बारीक पीस लिया जाता है ताकि एक गाढ़ा पेस्ट तैयार हो सके। इस पेस्ट को अच्छी तरह से फेंटना बहुत जरूरी है। फेंटने से मिश्रण हल्का और मुलायम हो जाता है, जिससे ईढर का स्वाद और उसकी बनावट (टेक्सचर) बहुत ही शानदार हो जाती है।
पत्तों की रोलिंग और फ्राइंग
अगला चरण अरबी के पत्तों के साथ होता है। सबसे पहले बड़े और साफ अरबी के पत्तों को धोकर पूरी तरह से सुखा लिया जाता है। इसके बाद, प्रत्येक पत्ते के पिछले हिस्से पर उड़द दाल का तैयार पेस्ट एक समान परत के रूप में फैलाया जाता है। जब पेस्ट ठीक से लग जाए, तो इन पत्तों को सावधानी के साथ मोड़कर रोल बनाया जाता है। इसके बाद, एक गर्म तवे पर थोड़ा तेल डालकर इन रोल्स को चारों तरफ से तब तक सेंका या फ्राई किया जाता है जब तक कि इनका रंग हल्का सुनहरा न हो जाए। रोल के ठंडा होने के बाद, इन्हें चाकू की मदद से छोटे-छोटे गोल टुकड़ों में काट लिया जाता है।
स्वादिष्ट ग्रेवी का रहस्य
ईढर के लिए ग्रेवी तैयार करना एक कला है। इसके लिए एक कड़ाही में तेल गरम करके उसमें सबसे पहले सरसों का तड़का लगाया जाता है। इसके बाद बारीक कटा हुआ लहसुन, हरी मिर्च और मूंगफली का पेस्ट डालकर इसे अच्छी तरह भूना जाता है। मसाले में हल्दी, स्वादानुसार नमक और अन्य घरेलू मसाले मिलाए जाते हैं। ग्रेवी में 3 से 4 कटे हुए टमाटर डालकर इन्हें अच्छी तरह गलने तक पकाया जाता है। ईढर की सब्जी में एक विशेष हल्का खट्टापन लाने के लिए सूखे आम का एक टुकड़ा डालना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिससे स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। जब टमाटर पूरी तरह से पक जाएं, तो जरूरत के अनुसार गर्म पानी डालकर ग्रेवी तैयार की जाती है। अंत में, ईढर के कटे हुए टुकड़ों को इसमें मिला दिया जाता है और लगभग 10 मिनट तक धीमी आंच पर ढंककर पकाया जाता है ताकि मसाले का स्वाद ईढर के अंदर तक समा जाए।
नई पीढ़ी में भी लोकप्रिय
आज के दौर में जब लोग फास्ट फूड की तरफ भाग रहे हैं, छत्तीसगढ़ का यह पारंपरिक व्यंजन ईढर अपनी लोकप्रियता बरकरार रखे हुए है। यह डिश न केवल बुजुर्गों को पसंद है, बल्कि नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक जायके को बड़े शौक से अपना रही है। इसे गरमागरम चावल के साथ परोसना सबसे अच्छा माना जाता है, हालांकि इसे रोटी या ज्वार-बाजरे की रोटी के साथ भी खाया जा सकता है। यदि आप बरसात के मौसम में कुछ नया और पारंपरिक आज़माना चाहते हैं, तो छत्तीसगढ़ की यह ईढर रेसिपी आपके भोजन का अनुभव पूरी तरह से बदल सकती है।
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