पाकिस्तान में छिड़ा पानी का गंभीर संकट
आर्थिक तंगी और अंदरूनी राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पाकिस्तान में अब एक नया और भयावह संकट सामने आया है। यह संकट जल संसाधनों की कमी का है, जिसने देश के दो प्रमुख प्रांतों, बलूचिस्तान और सिंध को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है। बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में बीते छह महीनों से पानी की आपूर्ति पूरी तरह ठप पड़ी है, जिसके कारण वहां के आम नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस कठिन समय में बलूचिस्तान के नेताओं ने सिंध प्रांत पर अपने हिस्से का पानी चोरी करने का गंभीर आरोप लगाया है।
क्वेटा में प्यास का हाहाकार
क्वेटा शहर में स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि वहां का भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर गया है। सरकारी स्तर पर पानी की व्यवस्था करने वाली संस्था, वॉटर एंड सैनिटेशन एजेंसी के दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। शहर की पाइपलाइनें पिछले छह महीनों से पूरी तरह सूखी हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, क्वेटा के कई प्रमुख इलाकों जैसे कि सरिएब, सिरकी रोड, समुंगली रोड, जिन्ना टाउन, कंबरनी रोड, सैटेलाइट टाउन, सब्जल रोड और खयाबन-ए-आगा में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है।
स्थानीय जनता का आरोप है कि वे हर महीने पानी का भारी-भरकम बिल तो चुका रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें केवल अधिकारियों से कोरे आश्वासन मिलते हैं। क्वेटा की महिलाएं, बुजुर्ग और मासूम बच्चे भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप में पानी के खाली डिब्बे लिए मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं। बोरिंग और कुएं पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे लोगों के पास जीवन की मूलभूत आवश्यकता के लिए भी कोई विकल्प नहीं बचा है।
सिंध पर पानी चोरी का आरोप
पानी के बंटवारे को लेकर बलूचिस्तान और सिंध के बीच दशकों पुराना विवाद अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। हाल ही में बलूचिस्तान के तीन वरिष्ठ मंत्रियों ने सुक्कुर बैराज पर किसानों के साथ मिलकर जोरदार प्रदर्शन किया। इन मंत्रियों का स्पष्ट आरोप है कि सिंध प्रांत नहरों के माध्यम से अवैध रूप से बलूचिस्तान के हिस्से का पानी अपनी तरफ मोड़ रहा है। इस प्रदर्शन में केवल बलूचिस्तान के लोग ही नहीं, बल्कि लरकाना डिवीजन के परेशान किसान भी शामिल हुए, जो जल संकट की मार झेल रहे हैं।
1991 के जल समझौते का उल्लंघन
सुक्कुर बैराज पर प्रदर्शन के दौरान बलूचिस्तान के मंत्री मोहम्मद सादिक उमरानी ने आरोप लगाया कि सिंध सरकार 1991 के ऐतिहासिक जल समझौते की धज्जियां उड़ा रही है। समझौते के अनुसार, खिरथर नहर से बलूचिस्तान को 2,400 क्यूसेक और पट फीडर नहर से 6,700 क्यूसेक पानी मिलना अनिवार्य है। हालांकि, हकीकत यह है कि बलूचिस्तान को उसके तय कोटे का आधा पानी भी नहीं मिल पा रहा है। मंत्रियों का कहना है कि यह समय फसलों की सिंचाई के लिए सबसे नाजुक है और पानी की कमी के चलते राज्य के लाखों किसानों की फसलें खेतों में ही सूखकर बर्बाद हो रही हैं। इससे बलूचिस्तान को भविष्य में अरबों रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बुगती सरकार की नई समिति
जन आक्रोश और किसानों के बढ़ते विरोध को देखते हुए बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज बुगती ने मामले को सुलझाने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। इस समिति में प्रांतीय मंत्री मोहम्मद सादिक उमरानी, सलीम अहमद खोसो और मोहम्मद खान लेहरी को शामिल किया गया है। यह समिति सिंध सरकार के साथ सीधे संवाद करेगी।
वहीं, सिंध के सिंचाई विभाग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए दावा किया है कि वे बलूचिस्तान को उनके तय कोटे से भी ज्यादा पानी दे रहे हैं। हालांकि, बलूचिस्तान के मंत्रियों ने इस दावे को सफेद झूठ करार दिया है। मंत्री सलीम अहमद खोसो ने सवाल उठाया कि यदि सिंध वाकई अतिरिक्त पानी दे रहा है, तो फिर बलूचिस्तान के खेत क्यों सूख रहे हैं और क्वेटा की जनता प्यासी क्यों मर रही है? उन्होंने स्पष्ट किया है कि बलूचिस्तान अब महज कागजी समाधान नहीं, बल्कि एक स्थायी हल चाहता है ताकि भविष्य में उन्हें सड़कों पर न उतरना पड़े।
पाकिस्तान पर गहराते गृहयुद्ध के साये
जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान में संसाधनों की भारी कमी के कारण गृहयुद्ध जैसी स्थितियां बन रही हैं। पाकिस्तान उन देशों की सूची में शामिल है जहां वॉटर स्ट्रेस बहुत अधिक है। सिंध और बलूचिस्तान के बीच की यह पानी की जंग इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश का प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। बलूचिस्तान के लोग पहले से ही दमन और आर्थिक तंगी का दंश झेल रहे हैं, और पानी की इस किल्लत ने आग में घी डालने का काम किया है। यदि जल्द ही इस जल संकट का समाधान नहीं निकाला गया, तो पाकिस्तान में हिंसक दंगों और प्रांतीय विद्रोह का भड़कना लगभग तय माना जा रहा है।
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