सिंधु जल संधि के मौजूदा स्वरूप का अंत, पुराने नियमों पर अब नहीं चलेगा भारत: सूत्र

केंद्र सरकार के उच्च सूत्रों के अनुसार, 1960 की सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह निष्प्रभावी हो चुकी है और भारत अब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के बीच पुराने नियमों के तहत पानी साझा करने के पक्ष में नहीं है।

भारत सरकार ने सिंधु जल समझौते को लेकर एक बेहद कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे सीमा पार पाकिस्तान में हलचल मच गई है। देश के शीर्ष सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, दशकों पुरानी सिंधु जल संधि अब अपने पुराने और वर्तमान स्वरूप में दोबारा लागू नहीं की जाएगी। इसका साफ मतलब यह है कि वर्ष 1960 में अस्तित्व में आई यह संधि अब व्यावहारिक और प्रभावी रूप से समाप्त हो चुकी है। भारत ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि बदलते समय और परिस्थितियों के बीच पुराने नियमों की अनदेखी अपरिहार्य हो गई है।

सूत्रों का कहना है कि यह संधि आज से लगभग सात दशक पहले यानी 1950 के दशक की परिस्थितियों, प्राथमिकताओं और उस समय की तकनीकों को ध्यान में रखकर तैयार की गई थी। आज के आधुनिक युग में उन पुराने पैमानों और नियमों का कोई औचित्य नहीं रह गया है। इसके अलावा, इस समझौते की बुनियाद दोनों देशों के बीच आपसी सद्भावना और विश्वास पर टिकी थी, न कि सीमा पार से प्रायोजित होने वाले आतंकवाद और दुश्मनी के साये में काम करने के लिए।

पाकिस्तान का कुप्रबंधन: आधा पानी समुद्र में जा रहा बेकार

सरकारी सूत्रों ने पड़ोसी देश के जल प्रबंधन की पोल खोलते हुए बताया है कि पाकिस्तान ने पिछले छह दशकों में एक भी नया बड़ा बांध बनाने की जहमत नहीं उठाई। पाकिस्तान अपने हिस्से में आने वाले बहुमूल्य जल संसाधनों का उचित और वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। पाकिस्तान को मिलने वाले बहाव वाले पानी का मात्र 10% हिस्सा ही वह संग्रहित यानी स्टोर कर पाता है, जबकि शेष लगभग 50% पानी बिना किसी उपयोग के सीधे अरब सागर में बहकर बर्बाद हो जाता है।

अपनी इसी नाकामी को छिपाने के लिए पाकिस्तान हमेशा से भारत की हर जल परियोजना पर बेबुनियाद आपत्तियां उठाता रहा है। पाकिस्तान की इन चालबाजियों का एकमात्र एजेंडा भारतीय विकास परियोजनाओं की रफ्तार को धीमा करना और उनमें अड़ंगे लगाना रहा है। इसका एक बड़ा उदाहरण जम्मू-कश्मीर की प्रसिद्ध तुलबुल परियोजना है। कश्मीर के लोगों के लिए बेहद लाभकारी और महत्वपूर्ण साबित होने वाली इस तुलबुल परियोजना को पाकिस्तान की लगातार आपत्तियों और अड़चनों के कारण अंततः स्थगित करना पड़ा था।

हालांकि, अब भारत ने अपनी रणनीति बदल ली है। भारत सरकार अब नई जल परियोजनाओं को युद्ध स्तर पर गति देने जा रही है। इसके लिए देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में तेजी से सर्वे और प्रारंभिक काम शुरू कर दिए गए हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब पाकिस्तान में सक्रिय और प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लगातार भारत के खिलाफ जहर उगल रहे हैं और वहां की सरकार आतंकवाद को रोकने के लिए कोई भी ठोस या विश्वसनीय कदम नहीं उठा रही है।

भारत के कड़े फैसले से पाकिस्तान में भारी घबराहट

भारत का यह सख्त फैसला कोई अचानक लिया गया कदम नहीं है। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायराना आतंकवादी हमले के बाद भारत सरकार ने अपनी नीति में बड़ा बदलाव किया। इस हमले के फौरन बाद भारत ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड यानी निलंबित कर दिया था। भारत की सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति ने पाकिस्तान को कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकवाद और द्विपक्षीय संधियों का फायदा एक साथ नहीं मिल सकता और रक्त तथा पानी कभी एक साथ नहीं बह सकते।

इस बड़े फैसले के तहत भारत ने पाकिस्तान के साथ निम्नलिखित महत्वपूर्ण कड़ियों को पूरी तरह से तोड़ दिया है:

  • नदियों के पानी से जुड़ा महत्वपूर्ण डेटा शेयरिंग पूरी तरह बंद कर दिया गया है।
  • दोनों देशों के बीच होने वाली सालाना बैठकें अब आयोजित नहीं की जा रही हैं।
  • जल परियोजनाओं का जो आपसी निरीक्षण किया जाता था, उसे पूरी तरह रोक दिया गया है।
  • अंतरराष्ट्रीय अदालतों में होने वाली संबंधित कार्यवाहियों में भी भारत ने हिस्सा लेना बंद कर दिया है।

इसके साथ ही, भारत ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा और विकास को सर्वोपरि रखते हुए किशनगंगा और रतले जैसी विशाल जल-विद्युत परियोजनाओं के निर्माण कार्य में अभूतपूर्व तेजी ला दी है। ये वही परियोजनाएं हैं जिन पर पाकिस्तान सालों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रोड़े अटकाने की कोशिश कर रहा था।

कंगाली के बीच पाकिस्तान को सता रहा है सूखे और भुखमरी का डर

भारत के इस आक्रामक और दृढ़ रुख ने पाकिस्तान के शासकों और नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। इसकी मुख्य वजह यह है कि पाकिस्तान की लगभग 80% कृषि भूमि और वहां की विशाल आबादी के लिए पेयजल की आपूर्ति सीधे तौर पर भारत से होकर बहने वाली इन्हीं पश्चिमी नदियों पर टिकी हुई है। पाकिस्तान इस समय इतिहास की सबसे बदतर आर्थिक कंगाली, आसमान छूती महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे नाजुक वक्त में उसे यह डर सता रहा है कि यदि भारत ने अंतरराष्ट्रीय संधियों के कानूनी दायरों से बाहर जाकर बांधों का निर्माण तेजी से पूरा कर लिया या पानी के बहाव को नियंत्रित कर लिया, तो उसके देश में भुखमरी, तबाही और भीषण सूखे के हालात पैदा हो जाएंगे।

पाकिस्तान ने इस मुद्दे को लेकर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरने और बदनाम करने की कई नाकाम कोशिशें कीं, लेकिन उसकी हर चाल उल्टी पड़ गई। भारत ने विश्व बिरादरी के सामने अपना रुख अत्यंत स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सीमा पार से जारी आतंकवाद पर पूर्ण, प्रामाणिक और स्थायी रूप से रोक नहीं लगाई जाती, तब तक सिंधु जल संधि को किसी भी रूप में बहाल नहीं किया जाएगा। अब बातचीत केवल भारत की शर्तों और सुरक्षा हितों के दायरे में ही संभव होगी।

https://www.indiatv.in/india/national/india-said-indus-waters-treaty-1960-agreement-will-no-longer-be-governed-by-old-rule-2026-07-21-1232442