सड़क किनारे स्टॉल लगाकर सजावटी कला को दे रहीं नई पहचान, सरगुजा की इन दो बहनों का जज्बा है मिसाल

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में दो बहनों, मृगाक्षी और मृणाली ने आर्थिक मजबूरी के बजाय अपने शौक को करियर में बदलने के लिए लियानबी नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया है। वे सड़क किनारे स्टॉल लगाकर मोजेक और लिप्पन आर्ट जैसी कलाकृतियां बेच रही हैं और अन्य युवाओं को प्रेरित कर रही हैं।

सड़कों पर चमकते हुनर के सपने

आम तौर पर जब हम किसी को सड़क किनारे स्टॉल लगाकर सामान बेचते हुए देखते हैं, तो हमारे मन में तुरंत यह ख्याल आता है कि शायद घर की माली हालत ठीक नहीं होगी या कोई बड़ी मजबूरी उन्हें इस काम के लिए मजबूर कर रही होगी। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है, जहाँ दो बहनें अपनी हस्तनिर्मित वस्तुओं के साथ स्टॉल लगाती हैं। राहगीर अक्सर यही समझते हैं कि ये लड़कियां आर्थिक तंगी दूर करने के लिए संघर्ष कर रही हैं, लेकिन इन दोनों बहनों की कहानी प्रचलित धारणाओं से बिल्कुल अलग है।

मजबूरी नहीं, शौक है करियर का आधार

यहाँ बात हो रही है मृगाक्षी और मृणाली की। जब इनसे बातचीत की गई, तो पता चला कि उनका परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम है। उनके पिता एक सरकारी विभाग में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं और घर में सुख सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। अक्सर लोग 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद पारंपरिक नौकरियों या प्रतियोगी परीक्षाओं की दौड़ में शामिल हो जाते हैं, लेकिन मृगाक्षी और मृणाली ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपनी रचनात्मकता और कला के प्रति प्रेम को ही अपने करियर के रूप में ढालने का साहसिक निर्णय लिया। उनका यह कदम इस बात का प्रमाण है कि सफलता पाने के लिए केवल आर्थिक आवश्यकता ही नहीं, बल्कि एक मजबूत इच्छाशक्ति भी जरूरी होती है।

लियानबी का जन्म और उसके पीछे की प्रेरणा

दोनों बहनों ने अपने इस स्टार्टअप को लियानबी नाम दिया है। यह नाम उन्होंने बड़े सोच विचार के बाद रखा है, जो उनके स्वयं के व्यक्तित्व को दर्शाता है। मृगाक्षी और मृणाली के नामों के मेल से बने इस शब्द का अर्थ कमल और हिरण के बच्चे से जोड़ा गया है। उनका उद्देश्य केवल वस्तुओं को बेचना नहीं है, बल्कि एक ऐसा ब्रांड खड़ा करना है जिसकी अपनी एक विशिष्ट पहचान हो। जो कला पहले उनके घर के खाली समय का शौक हुआ करती थी, वह अब धीरे-धीरे एक पेशेवर ब्रांड का रूप ले रही है।

विविध कला शैलियों का संगम

लियानबी के स्टॉल पर ग्राहकों को कई तरह की अनूठी चीजें देखने को मिलती हैं। यहाँ रोम की पारंपरिक मोजेक आर्ट से लेकर गुजरात के कच्छ की प्रसिद्ध लिप्पन आर्ट तक मौजूद है। इसके अलावा, आकर्षक हैम्पर और अन्य हस्तनिर्मित सजावटी सामान भी यहाँ आसानी से उपलब्ध हैं। पहले ऐसी कलाकृतियों को खरीदने के लिए लोगों को बड़े शहरों की ओर रुख करना पड़ता था, लेकिन अब ये बहनें सरगुजा के स्थानीय लोगों के लिए इन कलाओं को घर के पास ही उपलब्ध करा रही हैं। उनकी मेहनत से बनी ये वस्तुएं न केवल देखने में सुंदर हैं, बल्कि उच्च गुणवत्ता का भी अहसास कराती हैं।

दोस्तों का अटूट सहयोग और बढ़ता आत्मविश्वास

इस सफर में मृगाक्षी और मृणाली अकेली नहीं हैं। उनके मित्र भी इस पहल में बढ़-चढ़कर साथ दे रहे हैं। ये दोस्त न केवल स्टॉल पर आकर उनके बनाए उत्पादों को खरीदते हैं, बल्कि दूसरों को भी इस कला के बारे में बताते हैं। दोस्तों के इस सहयोग ने दोनों बहनों के आत्मविश्वास को काफी बढ़ाया है। यह उनके उद्यम के लिए एक मजबूत मार्केटिंग का काम भी कर रहा है, जिससे उनकी कला की पहुंच और अधिक लोगों तक हो रही है।

युवाओं के लिए प्रेरणा की एक नई किरण

मृगाक्षी और मृणाली का यह प्रयास आज के युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश है। उनका मानना है कि अगर काम के प्रति सच्चा जुनून और पूरी लगन हो, तो शौक को भी एक सफल करियर बनाया जा सकता है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि जीवन का उद्देश्य केवल पारंपरिक सरकारी या प्राइवेट नौकरियों के पीछे भागना नहीं होना चाहिए, बल्कि अपनी रचनात्मकता को भी रोजगार का माध्यम बनाया जा सकता है। उनकी यह सोच सरगुजा जैसे छोटे शहरों में रहने वाले उन तमाम युवाओं के लिए एक उदाहरण है, जो अपने अंदर के कलाकार को करियर की डर से दबा देते हैं।

सरगुजा की नई पहचान

अपनी इस अनोखी पहल के जरिए ये दोनों बहनें सरगुजा में हस्तशिल्प और रचनात्मक उद्यमिता की एक नई पहचान बना रही हैं। उनका यह छोटा सा स्टॉल इस बात का सबूत है कि बड़े सपने देखने के लिए जगह का छोटा होना कोई बाधा नहीं है। उनकी मेहनत और कलात्मक दृष्टि न केवल स्थानीय लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है, बल्कि यह भी बता रही है कि भविष्य में ऐसे स्टार्टअप स्थानीय अर्थव्यवस्था में एक नई जान फूंक सकते हैं। मृगाक्षी और मृणाली का सफर अभी शुरू हुआ है, लेकिन उनकी मेहनत रंग ला रही है और वे हर दिन सफलता की नई सीढ़ियां चढ़ रही हैं।

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