ईरान के करीबी लेबनान का रुख बदला, डोनाल्ड ट्रंप से मिलकर हिजबुल्लाह को खत्म करने की तैयारी

लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन इस हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात के लिए वॉशिंगटन पहुंच रहे हैं, जहां वे हिजबुल्लाह के खात्मे का खाका पेश करेंगे। इस कदम से ईरान और लेबनान के संबंधों में बड़ी दरार आने की संभावना है।

वॉशिंगटन में अहम बैठक

लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन इस हफ्ते अमेरिका का एक महत्वपूर्ण दौरा करने वाले हैं। इस यात्रा के दौरान वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्हाइट हाउस में बैठक करेंगे। पिछले दो दशकों में यह पहली बार है जब लेबनान के किसी राष्ट्रपति को व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया गया है। यह दौरा न केवल द्विपक्षीय संबंधों के लिए, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट के बदलते समीकरणों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बैठक का मुख्य केंद्र ईरान समर्थित चरमपंथी संगठन हिजबुल्लाह का खात्मा और लेबनान में स्थिरता बहाल करना होगा।

ईरान की मुश्किल और लेबनान का नया दांव

एक समय था जब ईरान लेबनान के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदलती नजर आ रही है। लेबनान सरकार अब यह समझ चुकी है कि ईरान की युद्धनीति का खामियाजा उसे अपनी जमीन पर भुगतना पड़ रहा है। राष्ट्रपति जोसेफ औन के पास इस मुलाकात के लिए एक विशेष योजना है। उनका मुख्य उद्देश्य हिजबुल्लाह के पास मौजूद हथियारों के जखीरे को पूरी तरह से समाप्त करना और दक्षिणी लेबनान से इजरायली सेना की वापसी सुनिश्चित करना है।

अप्रैल के घटनाक्रम और ईरान की शर्तें

इस साल अप्रैल में अमेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक मोड़ आया था, जब दोनों देशों के प्रतिनिधि किसी तीसरे देश यानी पाकिस्तान की धरती पर सीधे बातचीत के लिए राजी हुए थे। हालांकि, बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान ने अपने कड़े तेवर जाहिर कर दिए थे। ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ ने स्पष्ट कर दिया था कि तेहरान दो प्रमुख शर्तों पर बिल्कुल भी पीछे नहीं हटेगा। पहली शर्त यह थी कि इजरायल को लेबनान में तुरंत सीजफायर करना होगा और दूसरी शर्त विदेशों में सीज किए गए ईरान के अरबों डॉलर के एसेट्स को अनफ्रीज करना था। ईरान ने अपनी शर्तों में लेबनान का मुद्दा प्राथमिकता पर रखा था, लेकिन अब लेबनान का रुख ही ईरान से अलग हो गया है।

ट्रंप को सौंपा जाएगा मास्टरप्लान

राष्ट्रपति जोसेफ औन अब सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति से गुहार लगाने की तैयारी में हैं। उनका लक्ष्य 26 जून को हुए अमेरिकी समझौते को प्रभावी ढंग से लागू कराना है। इसके लिए वे डोनाल्ड ट्रंप को एक लिखित रोडमैप सौंपने वाले हैं। इस दस्तावेज में यह विस्तार से समझाया गया है कि हिजबुल्लाह की ताकत को धीरे-धीरे कैसे कम किया जाएगा और हथियारों को कैसे जब्त किया जाएगा। लेबनान के शीर्ष अधिकारियों का मानना है कि केवल डोनाल्ड ट्रंप ही वह नेता हैं जो इजरायल पर दबाव डालकर उनकी सेना को वापस बुलाने के लिए राजी कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो लेबनान सरकार को अपने पूरे भू-भाग पर दोबारा पूर्ण नियंत्रण मिल जाएगा।

कौन हैं राष्ट्रपति जोसेफ औन?

लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन का ट्रैक रिकॉर्ड काफी प्रभावशाली रहा है। राष्ट्रपति बनने से पहले वे लेबनानी सेना के प्रमुख के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने गृहयुद्ध और आईएसआईएस के खिलाफ जंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साल 2024 में इजरायल के साथ हुए संघर्ष में हिजबुल्लाह को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। इसके अलावा, सीरिया में बशर अल-असद की सत्ता कमजोर होने का सीधा असर हिजबुल्लाह पर पड़ा है। राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद औन ने शपथ ली थी कि देश में हथियारों को रखने का अधिकार केवल सरकारी सेना के पास होगा, न कि किसी गैर-सरकारी या चरमपंथी संगठन के पास।

युद्ध का भारी नुकसान और जनता का दर्द

राष्ट्रपति बनने के बाद से ही औन ने हिजबुल्लाह के ठिकानों पर नकेल कसनी शुरू कर दी थी। हालांकि, 2 मार्च को अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े संघर्ष में हिजबुल्लाह द्वारा ईरान के समर्थन में इजरायल पर हमला करने के बाद स्थितियां और बिगड़ गईं। जवाबी कार्रवाई में लेबनान में 4300 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और लाखों लोग बेघर होने के लिए मजबूर हैं। हिजबुल्लाह राष्ट्रपति औन के इन कदमों का कड़ा विरोध कर रहा है, लेकिन औन का स्टैंड बिल्कुल साफ है कि ईरान की जंग की कीमत लेबनान के आम नागरिक नहीं चुकाएंगे।

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