मछली पालन के साथ तालाब में करें सिंघाड़े की खेती, ऐसे होगी दोगुनी कमाई

बिहार के छपरा में किसान एक ही तालाब से मछली और सिंघाड़े की खेती कर बंपर मुनाफा कमा रहे हैं। जानिए इस दोहरी खेती के लिए किन खास बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

तालाब और जलमग्न खेतों से बंपर मुनाफा

आज के दौर में किसान नई तकनीकों और जुगाड़ के जरिए अपनी आय बढ़ाने के प्रयास में जुटे हैं। बिहार के छपरा जिले के सदर प्रखंड स्थित करिंगा गांव में किसान अब एक ही जलस्त्रोत से दोहरी कमाई कर रहे हैं। यहां के किसान उन खेतों और तालाबों का सदुपयोग कर रहे हैं जिनमें बरसात के दौरान अत्यधिक पानी भर जाता है और मुख्य फसल नहीं हो पाती है। इन जलमग्न क्षेत्रों में किसान एक साथ सिंघाड़े की खेती और मछली पालन करके सीजन के दौरान अपनी आय को दोगुना कर रहे हैं। सैकड़ों किसान इस पद्धति को अपनाकर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं।

सावधानी बरतना क्यों है जरूरी

मछली पालन और सिंघाड़े की खेती को एक साथ करना जितना फायदेमंद है, उतना ही इसमें जोखिम भी है। यदि आप बिना सही जानकारी के इस व्यवसाय को शुरू करते हैं, तो नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। जानकारों के अनुसार, इस व्यवसाय की सबसे बड़ी शर्त तालाब के प्रबंधन को लेकर है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे तालाब के पूरे हिस्से में सिंघाड़ा न लगाएं। तालाब का कुछ हिस्सा हमेशा खुला रखना चाहिए। इस खुले हिस्से का महत्व तब सामने आता है जब सिंघाड़े की फसल पर दवाओं का छिड़काव करना हो। यदि तालाब में पर्याप्त खाली जगह होगी, तो मछलियां उस ओर चली जाएंगी, जिससे उन पर दवाओं का कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा और सिंघाड़े की फसल भी सुरक्षित रहेगी।

सही मछली का चुनाव है सफलता की कुंजी

सिंघाड़े की फसल के साथ सभी प्रकार की मछलियां नहीं पाली जा सकतीं। यदि आप गलत मछली का चुनाव करते हैं, तो सिंघाड़े की फसल बर्बाद हो सकती है। रामचंद्र प्रसाद जैसे अनुभवी किसान बताते हैं कि सिंघाड़े के साथ केवल चुनिंदा प्रजाति की मछलियां ही पालनी चाहिए, जो फसल को नुकसान न पहुंचाएं।

  • गोल्डन मछली: यह सिंघाड़े के साथ पालन के लिए सुरक्षित मानी जाती है।
  • सिल्वर मछली: इसका पालन सिंघाड़े की खेती के साथ आसानी से किया जा सकता है।
  • विकेट मछली: यह फसल को नुकसान नहीं पहुंचाती है।
  • बरारी मछली: यह भी एक बेहतर विकल्प साबित होती है।

इसके विपरीत, ग्रास मछली, रहु और कतला जैसी मछलियों को सिंघाड़े के तालाब में नहीं छोड़ना चाहिए। ये मछलियां सिंघाड़े के फल को खा जाती हैं, जिससे किसान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

पुश्तैनी अनुभव का लाभ

छपरा के किसान रामचंद्र प्रसाद बताते हैं कि वे अपनी तीसरी या चौथी पीढ़ी से इस पारंपरिक खेती को करते आ रहे हैं। उनके पूर्वज भी इसी तरह के तरीके अपनाकर तालाबों और जलभराव वाले खेतों से दोहरा लाभ लेते थे। आज के समय में भी यह तकनीक उतनी ही प्रभावी है। उन्होंने बताया कि मछली और सिंघाड़े का यह संयुक्त बिजनेस उन लोगों के लिए वरदान है, जिनके खेतों में पानी निकासी की समस्या रहती है। जहां अन्य फसलों के लिए पानी का जमाव अभिशाप बन जाता है, वहीं इस विधि से वह पानी कमाई का जरिया बन जाता है।

निष्कर्ष

यदि आपके पास कोई ऐसा तालाब या खेत है जहां पानी का स्तर अधिक रहता है, तो आप भी इस दोहरी कृषि प्रणाली को अपना सकते हैं। बस सही दिशा-निर्देशों और प्रजातियों के चुनाव का ध्यान रखते हुए, आप न केवल अपनी जमीन का बेहतर उपयोग कर पाएंगे बल्कि बाजार में सिंघाड़ा और मछली दोनों को बेचकर अपनी कमाई में इजाफा कर सकेंगे। यह तकनीक कम लागत में अधिक लाभ कमाने का एक बेहतरीन उदाहरण है जिसे छपरा के किसान पिछले लंबे समय से अपना रहे हैं।

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