कट्टरपंथ को चुनौती देते राष्ट्रपति का कड़ा रुख
दुनिया के कई हिस्सों में धार्मिक कट्टरपंथ और शरिया कानून के नाम पर विवाद गहराते रहते हैं। इस बीच एक ऐसे देश से खबर सामने आई है जहाँ की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम होने के बावजूद राष्ट्रपति ने कट्टरपंथ के खिलाफ एक सख्त रुख अपना रखा है। बुर्कीना फासो के राष्ट्रपति कैप्टन इब्राहीम ट्राओरे ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि वे अपने देश में शरिया कानून को किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने देंगे।
इब्राहीम ट्राओरे का यह बयान सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोर रहा है। उन्होंने विशेष रूप से उन छात्रों को निशाने पर लिया है जो विदेश में, विशेषकर सऊदी अरब जैसे देशों में शरिया कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। ट्राओरे ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि छात्र तकनीक और कौशल सीखने के बजाय केवल शरिया का अध्ययन कर रहे हैं, तो उन्हें अपने देश वापस लौटने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनके शब्दों में, यदि आप वहां शरिया पढ़ रहे हैं, तो वहीं रहें और वहां से वापस आने का प्रयास न करें, क्योंकि देश को अब ऐसी विचारधाराओं की जरूरत नहीं है जो विकास में बाधक बनें।
कौन हैं 38 साल के युवा लीडर इब्राहीम ट्राओरे
14 मार्च 1988 को जन्मे इब्राहीम ट्राओरे आज बुर्कीना फासो के सबसे प्रभावशाली और चर्चित युवा चेहरे हैं। सितंबर 2022 में सैन्य तख्तापलट के बाद सत्ता की कमान संभालने वाले ट्राओरे ने देश की दशा सुधारने का संकल्प लिया है। उनकी विचारधारा में पैन-अफ्रीकीवाद, राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद विरोधी रुख स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
ट्राओरे ने सत्ता में आने के बाद देश को भ्रष्टाचार, उपनिवेशवाद और जिहादी विद्रोह से मुक्ति दिलाने का वादा किया था। उनके नेतृत्व में बुर्कीना फासो ने विदेश नीति में भी बड़े बदलाव किए हैं। अब देश फ्रांस जैसी पूर्व औपनिवेशिक शक्तियों से दूरी बनाकर रूस और अन्य नए सहयोगियों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है। सुरक्षा और संप्रभुता को प्राथमिकता देते हुए वे देश की न्याय प्रणाली को स्थानीय परंपराओं के आधार पर विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
मुस्लिम बहुल देश और धार्मिक संरचना
बुर्कीना फासो एक ऐसा देश है जहाँ की लगभग 2.2 करोड़ की आबादी में मुस्लिमों का अनुपात काफी अधिक है। 2019 की जनगणना के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां 63.8 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, जिसमें सुन्नी, मालिकी स्कूल और सूफी संप्रदाय के लोग शामिल हैं। इसके अलावा 26.3 प्रतिशत ईसाई और 9 प्रतिशत लोग पारंपरिक अफ्रीकी धर्मों को मानने वाले हैं।
संवैधानिक रूप से बुर्कीना फासो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और यहाँ का संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। ट्राओरे का यह बयान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि एक मुस्लिम होने के नाते वे स्वयं धर्म का सम्मान करते हैं, लेकिन राज्य को धर्म के आधार पर नहीं बल्कि नागरिकता और राष्ट्रवाद के आधार पर चलाया जाना चाहिए।
आतंकवाद और जिहादी समूहों से संघर्ष
देश पिछले कई वर्षों से JNIM और Sahel जैसे जिहादी समूहों के आतंक से जूझ रहा है। 2016 से शुरू हुआ यह संकट समय के साथ और अधिक गंभीर हो गया है। इन कट्टरपंथी समूहों ने मस्जिदों और चर्चों को निशाना बनाने के साथ ही गांवों में कोहराम मचाया है। इसके परिणामस्वरूप 2024-25 के दौरान हिंसा में तेजी आई है और हजारों नागरिकों की जान गई है, जबकि लाखों लोग विस्थापित होने पर मजबूर हुए हैं।
विकास बनाम अतिवाद की लड़ाई
राष्ट्रपति ट्राओरे का मानना है कि सच्चा इस्लाम शांति का मार्ग दिखाता है, न कि भाईचारे के खिलाफ हिंसा का। वे अब देश में धार्मिक भाषणों और व्याख्याओं पर निगरानी रख रहे हैं ताकि नफरत फैलाने वाली विचारधाराओं को पनपने से रोका जा सके। उनकी सरकार ने धार्मिक स्वतंत्रता कानून को अधिक कड़ा बनाया है।
उनका मुख्य जोर युवाओं को शरिया की पढ़ाई के बजाय विज्ञान, तकनीक और नवाचार की तरफ मोड़ने पर है। ट्राओरे का मानना है कि गरीबी और आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए देश को इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और कुशल कारीगरों की जरूरत है, न कि केवल धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने वालों की। AES जैसे क्षेत्रीय सहयोग समूहों के माध्यम से वे अब बुर्कीना फासो को एक ऐसे भविष्य की ओर ले जाना चाहते हैं जहाँ विकास ही देश का एकमात्र एजेंडा हो।
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