कांकेर में धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम
छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के अंतर्गत आने वाले दुर्गूकोंदल विकासखंड के ग्राम तुडगे में रविवार, 19 जुलाई 2026 को एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक और धार्मिक आयोजन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में गांव के तीन परिवारों से जुड़े कुल 17 सदस्यों ने स्वेच्छा से ईसाई धर्म का त्याग कर दिया और अपने मूल धर्म में पुनः प्रवेश किया। यह घटना क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी रही और समाज के लोगों ने इसे अपनी जड़ों की ओर लौटने का एक गौरवपूर्ण कदम बताया।
पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुआ स्वागत
धर्म वापसी का यह विशेष कार्यक्रम पूरी तरह से पारंपरिक विधि-विधान के साथ आयोजित किया गया था। इस दौरान गांव के गायता, पटेल और समाज के प्रमुख व्यक्ति विशेष रूप से उपस्थित रहे। इन परिवारों के स्वागत के लिए गांव में उत्साहपूर्ण वातावरण देखा गया। बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीणों और जन प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी बना दिया। सभी 17 सदस्यों का स्वागत देवी-देवताओं की विधिवत पूजा-अर्चना करके किया गया, जो इस क्षेत्र की सदियों पुरानी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।
समाज ने दी मुख्यधारा में जगह
धार्मिक परंपराओं के अनुसार आयोजित इस समारोह में समाज के वरिष्ठजनों ने सक्रिय भूमिका निभाई। मूल धर्म में वापसी करने वाले सभी सदस्यों को सम्मान स्वरूप तिलक लगाया गया। इसके पश्चात उन्हें पुष्पमालाएं पहनाई गईं और सुखद भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं दी गईं। समाज के लोगों ने इन परिवारों को फिर से अपने बीच पाकर प्रसन्नता व्यक्त की और उन्हें सामाजिक एकता की मुख्यधारा में पुनः शामिल किया। यह आयोजन समाज के भीतर सौहार्द और आपसी भाईचारे का एक बड़ा संदेश लेकर आया है।
सांस्कृतिक संरक्षण का महत्व
कार्यक्रम के दौरान जिला पंचायत सदस्य एवं सभापति देवेन्द्र टेकाम मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने वापस लौटे परिवारों का स्वागत करते हुए कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक मजबूती उसकी संस्कृति, परंपराओं और नैतिक मूल्यों में निहित होती है। देवेन्द्र टेकाम ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि व्यक्ति जब अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ा रहता है, तभी वह सही मायनों में प्रगति कर सकता है। उन्होंने सभी ग्रामीणों से समाज की रीति-नीति और निर्धारित नियमों का पालन करने की अपील की।
एकता और भविष्य की सीख
देवेन्द्र टेकाम ने आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना केवल बड़ों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अनिवार्य है। आयोजन के दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि किस तरह से परंपराओं को संरक्षित कर अगली पीढ़ी को सौंपा जाए। अंत में, कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों ने एकता बनाए रखने और अपनी सामाजिक धरोहर का सम्मान करने का सामूहिक संकल्प लिया। यह पूरा आयोजन शांति और सद्भाव के साथ संपन्न हुआ।
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