कुंदरी की खेती से बदली छपरा के किसान की तकदीर, मचान विधि का कमाल और जबरदस्त मुनाफा

बिहार के छपरा जिले के एक किसान ने मचान तकनीक अपनाकर कुंदरी और लौकी की खेती में बड़ी सफलता हासिल की है। जैविक खेती के जरिए वे कम लागत में लगातार बंपर कमाई कर रहे हैं और दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बने हैं।

खेती का आधुनिक मॉडल बना चर्चा का विषय

बिहार के छपरा जिले में खेती का एक नया और आधुनिक चेहरा देखने को मिल रहा है। यहाँ के किसान अब केवल पारंपरिक फसलों पर ही निर्भर नहीं हैं, बल्कि नगदी फसलों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। गरखा प्रखंड के संठा गांव में रहने वाले छेदी प्रसाद यादव ने खेती की एक ऐसी मिसाल कायम की है जो कम लागत में अधिक मुनाफे का एक सफल उदाहरण है। पिछले 25 वर्षों से वे लगातार कृषि के क्षेत्र में नए प्रयोग कर रहे हैं और मचान विधि के माध्यम से कुंदरी और लौकी जैसी फसलों से अपनी आमदनी को नई ऊंचाई दी है। उनकी इस सफलता को देखकर क्षेत्र के दर्जनों अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं और पारंपरिक खेती को छोड़कर इस वैज्ञानिक और लाभदायक मॉडल को अपना रहे हैं।

मचान विधि और जैविक खाद का जादुई असर

छेदी प्रसाद यादव की खेती की सबसे बड़ी खासियत मचान विधि का प्रयोग है। इस तकनीक में वे जमीन के ऊपर एक ढांचा तैयार करते हैं, जिससे बेल वाली सब्जियां ऊपर की ओर बढ़ती हैं। इससे न केवल जमीन का बेहतर इस्तेमाल होता है, बल्कि फसल को जमीन के संपर्क में न रहने के कारण सड़ने या खराब होने का डर भी नहीं रहता। छेदी प्रसाद का मानना है कि उनकी सफलता के पीछे जैविक खाद का अहम योगदान है। वे रासायनिक उर्वरकों से पूरी तरह परहेज करते हैं और पूरी तरह प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। इसके परिणाम स्वरूप न केवल पैदावार की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरक शक्ति भी बनी रहती है।

लगातार होती है बंपर कमाई

छेदी प्रसाद के अनुसार, कुंदरी की खेती उनके लिए आय का सबसे बड़ा और स्थिर स्रोत है। इसकी खासियत यह है कि एक बार पौधा लगाने के बाद किसान को लगभग दो से तीन साल तक लगातार फसल मिलती रहती है। उन्हें बार-बार खेती करने के लिए जमीन तैयार करने या बीज लगाने का अतिरिक्त खर्च नहीं उठाना पड़ता। वे एक दिन छोड़कर खेत से सब्जियां तोड़ते हैं और हर बार करीब ढाई से तीन क्विंटल सब्जी की तुड़ाई करते हैं। उन्होंने लगभग 10 कट्ठा जमीन पर यह खेती की है। एक कट्ठा जमीन से उन्हें औसतन 40 से 50 किलो तक का उत्पादन मिल जाता है, जो सीधे छपरा के सरकारी बाजार में बेचा जाता है।

परिवार और खेती का अनोखा संतुलन

छेदी प्रसाद की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने खेती को ही अपने जीवन का आधार बनाया है। उन्होंने कभी भी दूसरे शहरों जैसे दिल्ली या पंजाब की फैक्ट्रियों में मजदूरी करने का रास्ता नहीं चुना। उनका कहना है कि यदि वे किसी फैक्ट्री में काम करते तो उन्हें प्रतिदिन 8 से 12 घंटे की कड़ी मेहनत करनी पड़ती और परिवार के साथ बिताने के लिए समय नहीं मिलता। इसके विपरीत, अपनी खेती में उन्हें रोज केवल चार घंटे का समय देना पड़ता है। इससे वे अपने परिवार के साथ अच्छा समय बिता पाते हैं और सामाजिक मेलजोल में भी सक्रिय रहते हैं। खेती न केवल उनके आर्थिक स्तर को ऊपर ले गई है, बल्कि उन्हें एक सम्मानित जीवन जीने का अवसर भी दिया है।

दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा और संदेश

छेदी प्रसाद यादव अब केवल खुद के लिए खेती नहीं कर रहे, बल्कि वे अन्य किसानों को भी प्रशिक्षण और सलाह देने का काम कर रहे हैं। उनका साफ मानना है कि अगर किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ नगदी फसलों और आधुनिक मचान विधि को अपनाना शुरू करें, तो वे अपनी आर्थिक स्थिति को बहुत मजबूत बना सकते हैं। वे अक्सर आसपास के किसानों को तकनीकी जानकारी देते हैं कि कैसे सही फसल का चुनाव और जैविक खाद का प्रयोग करके कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर तकनीक और सही दिशा मिल जाए, तो गांव में रहकर भी शहरों से ज्यादा अच्छी कमाई की जा सकती है।

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