महिला सशक्तीकरण का नया केंद्र
बिहार के गया जिले में 'दीदी अधिकार केंद्र' महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। यह मंच विशेष रूप से उन महिलाओं की मदद के लिए बनाया गया है जो दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा या अन्य सामाजिक कुरीतियों का शिकार होती हैं। इसके अलावा, जिन महिलाओं को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है, उनके लिए भी ये केंद्र एक सहारा बने हुए हैं। जीविका के माध्यम से संचालित ये केंद्र पूरी तरह से स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं।
दीदी अधिकार केंद्र की कार्यप्रणाली
इस केंद्र की मुख्य जिम्मेदारी सरकारी योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों और कानूनी अधिकारों के बारे में महिलाओं को जागरूक करना है। इसका प्राथमिक उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है, ताकि उन्हें अपने छोटे-छोटे कामों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। यहाँ प्रशिक्षित 'दीदी' बड़ी संवेदनशीलता के साथ महिलाओं की समस्याओं को सुनती हैं, आवश्यक दस्तावेजों को तैयार करने में उनकी सहायता करती हैं और संबंधित अधिकारियों तक उनकी बात पहुंचाती हैं।
हिंसा के मामलों में हस्तक्षेप
जब बात घरेलू हिंसा या सार्वजनिक उत्पीड़न की आती है, तो ये केंद्र एक मध्यस्थ की भूमिका भी निभाते हैं। केंद्र की टीम पीड़िता और आरोपी पक्ष, दोनों से संवाद स्थापित कर स्थानीय स्तर पर मामले को सुलझाने का सार्थक प्रयास करती है। हालांकि, यदि कोई मामला अधिक गंभीर होता है और इन दीदियों के स्तर पर हल नहीं हो पाता है, तो उसे वन स्टॉप सेंटर, पुलिस थाने या फिर अदालत के जरिए सुलझाने में पूरी मदद प्रदान की जाती है।
गया जिले में केंद्र का प्रभाव और आंकड़े
गया जिले में वर्तमान में कुल 13 प्रखंडों में 'दीदी अधिकार केंद्र' सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। इन केंद्रों की सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ अब तक लगभग 2,800 केस 'केस इनटाइटलमेंट' (सरकारी लाभ से जुड़े) के दर्ज किए गए हैं। वहीं, हिंसा से जुड़े मामलों की बात करें तो अब तक 140 केस दर्ज हुए हैं, जिनमें से 88 मामलों का सफल समाधान निकालकर महिलाओं को उनका कानूनी और सामाजिक अधिकार दिलाया जा चुका है।
समन्वयक कलावती कुमारी का नजरिया
इस विषय पर बोधगया स्थित केंद्र की कोऑर्डिनेटर कलावती कुमारी ने विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि केंद्र से जुड़ी महिलाएं गांव-गांव जाकर घर-घर तक संपर्क करती हैं। वे उन पीड़ित महिलाओं की पहचान करती हैं जिनकी समस्याएं कहीं और हल नहीं हो पा रही होती हैं। इन महिलाओं को केंद्र में लाकर उन्हें सरकारी योजनाओं और उनके अधिकारों की पूरी जानकारी दी जाती है, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने के लिए तैयार होती हैं।
बदली हुई जिंदगियों की मिसाल
इन केंद्रों ने दर्जनों महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव किए हैं। बोधगया प्रखंड की एक महिला इसका बड़ा उदाहरण है। उसे दहेज की मांग को लेकर ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया था। पुलिस केस करने के बावजूद उसे कोई न्याय नहीं मिल पा रहा था। थक-हारकर जब वह 'दीदी अधिकार केंद्र' पहुंची, तो यहाँ की टीम ने वन स्टॉप सेंटर की मदद से मामले को सुलझाया। नतीजतन, वह महिला आज अपने दो बच्चों के साथ पूरे सम्मान के साथ अपने ससुराल में रह रही है।
सरकारी सेवाओं का आसान लाभ
हिंसा के मामलों के अलावा, सामान्य जीवन में आने वाली प्रशासनिक चुनौतियों को दूर करने में भी यह केंद्र अहम है। अब तक दर्जनों महिलाओं को निम्नलिखित कार्यों में सीधा सहयोग दिया गया है:
- किसान रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी करना।
- आयुष्मान कार्ड बनवाना।
- आधार कार्ड से संबंधित सुधार या नए आवेदन।
- वृद्धा पेंशन जैसी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करना।
- अन्य सरकारी पात्रता वाली योजनाओं के लिए फॉर्म भरवाना।
इस तरह 'दीदी अधिकार केंद्र' गया की ग्रामीण महिलाओं के लिए केवल एक कार्यालय नहीं, बल्कि एक सुरक्षित ठिकाना बन चुका है जहां उन्हें सम्मान और न्याय दोनों मिल रहे हैं।
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