गुप्त नवरात्रि: खरगोन का द्वापरकालीन मंदिर, जहां पांडव पुत्र अर्जुन को मिला था माता का आशीर्वाद

खरगोन स्थित मां आशापुरी का प्राचीन मंदिर गुप्त नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। माना जाता है कि इसी स्थान पर महाभारत काल में अर्जुन ने कठोर तपस्या करके देवी की कृपा प्राप्त की थी।

विंध्याचल की पहाड़ियों में बसा आस्था का महाकेंद्र

गुप्त नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही पूरे देश में देवी मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। यदि आप भी इस पावन समय में किसी ऐसे शक्तिपीठ के दर्शन करना चाहते हैं जहां आध्यात्मिकता के साथ-साथ महाभारत काल का इतिहास भी जुड़ा हो, तो मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में स्थित आशापुर धाम आपके लिए एक सर्वोत्तम स्थान हो सकता है। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में विराजमान मां आशापुरी का यह मंदिर इन दिनों अपनी प्राचीन मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।

अर्जुन ने की थी कठोर तपस्या

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहां पांडव पुत्र अर्जुन ने माता की कठिन तपस्या की थी। कहा जाता है कि अर्जुन ने इसी स्थान पर देवी को प्रसन्न किया था और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए उनका आशीर्वाद लिया था। यही ऐतिहासिक संबंध इस मंदिर को अन्य शक्तिपीठों से अलग और खास बनाता है। गुप्त नवरात्रि के इन विशेष दिनों में मध्य प्रदेश के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने के लिए यहां पहुंच रहे हैं।

विशेष अनुष्ठान और गुप्त नवरात्रि की महिमा

मंदिर परिसर में गुप्त नवरात्रि के अवसर पर धार्मिक गतिविधियों का विशेष आयोजन किया जा रहा है। यहां रोजाना विशेष पूजा, अभिषेक, भव्य श्रृंगार और अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जा रहे हैं। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ ध्वज पूजन, मंडप स्थापना और घट स्थापना के साथ अत्यंत विधि-विधान से हुआ। इसके उपरांत, यहां नवचंडी यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है, जो प्रतिदिन सुबह 8:30 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक आयोजित होने वाली आरती तक अनवरत चलता है। इस यज्ञ में भाग लेने के लिए सैकड़ों भक्त प्रतिदिन मंदिर पहुंच रहे हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।

800 साल पुराना है मंदिर का इतिहास

मंदिर ट्रस्ट से जुड़े त्रिलोक यादव बताते हैं कि आशापुर गांव में स्थित यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। मान्यता है कि मां आशापुरी द्वापर युग से ही यहां विराजमान हैं और प्राचीन समय में माता एक छोटी सी गुफा में निवास करती थीं। इस मंदिर के जीर्णोद्धार का पहला प्रमाण 12वीं शताब्दी का मिलता है, जब करीब 800 वर्ष पूर्व इसका प्रथम बार जीर्णोद्धार किया गया था। समय के साथ बदलते हुए, वर्ष 2012 में जनसहयोग के माध्यम से इस मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण करवाया गया, जिसके बाद से यह क्षेत्र के सबसे प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका है।

कई राज्यों के लोगों की कुलदेवी

मां आशापुरी की महिमा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें राजा मांधाता और पृथ्वीराज चौहान की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। आज भी उनके वंशज नियमित रूप से यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं। इसके अलावा, लोक कथाओं में महायोद्धा आल्हा-ऊदल के भी यहां तपस्या करने का उल्लेख मिलता है। यह मंदिर कई राज्यों के विभिन्न गोत्रों के लोगों के लिए आस्था का सर्वोच्च स्थान है। परिवार में होने वाले किसी भी मांगलिक या शुभ कार्य से पहले लोग यहां आकर माता का आशीर्वाद लेना अनिवार्य मानते हैं। भक्तों का अटूट विश्वास है कि सच्चे मन और श्रद्धा के साथ मां के दरबार में जो भी आता है, उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

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