खेती में जान का जोखिम
भारतीय कृषि को अक्सर एक जोखिम भरा काम माना जाता है, जहां किसान केवल फसल उगाने के लिए कड़ी मेहनत नहीं करते, बल्कि हर कदम पर अपनी जान को खतरे में डालते हैं। फसल की सुरक्षा और सिंचाई के लिए कई बार उन्हें प्रकृति की चुनौतियों के साथ—साथ अनपेक्षित खतरों का भी सामना करना पड़ता है। इसमें जहरीले सांप—बिच्छू से लेकर कुओं में जमा होने वाली जानलेवा गैसें शामिल हैं। हर साल ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें अन्नदाता अपनी जान गंवा देते हैं। मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला इसका एक दुखद उदाहरण है, जहां कुएं की मोटर ठीक करने या सफाई के इरादे से उतरे लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं। उन्हें इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं होता कि कुएं की गहराई में कोई अदृश्य मौत उनका इंतजार कर रही है।
बालाघाट में हुए दर्दनाक हादसे
बालाघाट में हाल ही में हुए कई हादसों ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। नवेगांव थाना क्षेत्र के सितकुटोला गांव में रहने वाले लक्ष्मण लिल्हारे के साथ एक ऐसी ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। वे अपने खेत के कुएं में उतरे, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि वहां जहरीली गैस का गुबार जमा है। गैस की चपेट में आते ही वे बेहोश होकर कुएं में गिर गए, जिससे उनकी जान चली गई।
इसी तरह का एक अन्य मामला किरनापुर थाना क्षेत्र के मरारी टोला गांव का है, जहां अशोक कावरे कुएं में उतरे और जहरीली गैस की वजह से उनकी मौत हो गई। इसके अगले ही दिन यानी 9 जुलाई को किरनापुर के ही पीपरटोला गांव में मोटर सुधारने के लिए दो दोस्त, महेश चौधरी और युवराज बिसेन कुएं में उतरे। इस हादसे में भी दोनों दोस्तों ने अपनी जान गंवा दी। इस तरह के हादसे हर साल न जाने कितने परिवारों की खुशियां छीन लेते हैं।
कुएं में गैस क्यों और कैसे बनती है?
जून का महीना आते ही किसान अपने खेतों में व्यस्त हो जाते हैं। बरसात से पहले कुओं की सफाई और सिंचाई के लिए लगी मोटर को बाहर निकालना एक सामान्य प्रक्रिया है। किसान भाई अक्सर यह भूल जाते हैं कि लंबे समय से बंद पड़े कुओं में हवा का संचार नहीं होता। कुएं के तल में जमा कीचड़ और सड़ने वाली चीजों के कारण मीथेन जैसी जहरीली गैसें बनने लगती हैं और वहां ऑक्सीजन की भारी कमी हो जाती है। जब किसान बिना किसी जांच के ऐसे कुओं में उतरते हैं, तो ऑक्सीजन की कमी और जहरीली गैस के संपर्क में आने से उनका दम घुटने लगता है और वे बेहोश होकर गिर जाते हैं।
गैस की पहचान कैसे करें?
एसडीआरएफ (SDRF) के डिस्ट्रिक्ट कमांडेंट एल के उड्डे ने सलाह दी है कि जो कुएं लंबे समय से इस्तेमाल में नहीं हैं, उनमें उतरने से पहले गैस की जांच अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। इसके लिए एक बेहद सरल और पुराना तरीका आजमाया जा सकता है:
- एक बाल्टी में जलता हुआ दीया या मोमबत्ती रखें।
- इस बाल्टी को धीरे—धीरे कुएं के अंदर नीचे उतारें।
- यदि कुएं में पहुंचने पर मोमबत्ती या दीया बुझ जाता है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि उस स्थान पर ऑक्सीजन खत्म हो चुकी है और वहां जहरीली गैस मौजूद है।
- ऐसी स्थिति में कुएं के अंदर बिल्कुल न उतरें।
कुएं में उतरते समय बचाव के उपाय
यदि आपको कुएं में उतरना बहुत आवश्यक है, तो अपनी सुरक्षा के लिए निम्नलिखित सावधानियों का पालन जरूर करें:
- कुएं में उतरने से पहले अंदर पानी की जोरदार बौछार करें।
- पानी की बाल्टी को बार—बार कुएं में ऊपर—नीचे पटकें, जिससे हवा का संचार हो और गैस बाहर निकल सके।
- कुएं में उतरने से पहले अपने शरीर को एक मजबूत रस्सी से जरूर बांधें।
- ऊपर कुएं के मुहाने पर कम से कम एक व्यक्ति को हमेशा तैनात रखें जो जरूरत पड़ने पर मदद कर सके।
आपात स्थिति में क्या करें?
जिला होमगार्ड एवं नागरिक सुरक्षा विभाग ने आम जनता से अपील की है कि किसी भी सेप्टिक टैंक, बोरवेल, कुएं या बंद स्थान में बिना सही सुरक्षा उपकरणों, गैस परीक्षण और प्रशिक्षित बचाव दल के प्रवेश न करें। ऑक्सीजन की कमी और जहरीली गैस पल भर में जान ले सकती है। किसी भी आपात स्थिति में तत्काल पुलिस, होमगार्ड या जिला कंट्रोल रूम को सूचित करें और प्रशिक्षित सहायता की प्रतीक्षा करें। सावधानी ही इस तरह के हादसों को रोकने का एकमात्र तरीका है।
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