ऑस्ट्रेलिया ने पेश की दोस्ती की अनोखी मिसाल
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्तों के बीच एक बेहद सकारात्मक खबर सामने आई है। ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए भारत की उन बेशकीमती प्राचीन मूर्तियों और कलाकृतियों को वापस भेजने का ऐलान किया है, जो दशकों पहले भारत से चोरी होकर विदेशों में पहुंच गई थीं। यह कदम इसलिए भी खास है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया इसके लिए किसी कानूनी दबाव या भारत की ओर से आधिकारिक मांग का इंतजार नहीं कर रहा है, बल्कि स्वैच्छिक रूप से इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मान रहा है।
चोरी की वस्तुओं को अपने पास रखना अपराध
ऑस्ट्रेलिया के गृह मंत्री टोनी बर्क ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस मामले में बेहद स्पष्ट रुख अपनाया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि किसी भी दूसरे देश की सांस्कृतिक और प्राचीन अमानत को अपने पास रखना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है और इसे चोरी ही माना जाना चाहिए। टोनी बर्क का मानना है कि यदि कोई वस्तु कानूनी रूप से किसी राष्ट्र की है, तो उस पर कब्जा बनाए रखना नैतिकता के खिलाफ है। उन्होंने नेशनल गैलरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे ही उन्हें पता चला कि भगवान शिव की एक प्राचीन मूर्ति का स्वामित्व विवादित है, उन्होंने बिना किसी देरी के उसे भारत को सौंपने का निर्णय लिया था।
अब भारत की मांग का इंतजार नहीं होगा
आमतौर पर देखा गया है कि जब भी भारत को अपनी प्राचीन धरोहरों को वापस लाना होता है, तो सरकार को लंबी कानूनी प्रक्रिया और कूटनीतिक औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है। म्यूजियम्स और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से इन मूर्तियों को वापस पाने के लिए कई वर्षों तक संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि, टोनी बर्क ने इस पुरानी व्यवस्था को बदलने का बड़ा फैसला लिया है। उन्होंने जोर दिया कि अब भारत की ओर से आने वाली औपचारिक चिट्ठी या मांग का इंतजार करने के बजाय, ऑस्ट्रेलिया खुद ही अपने म्यूजियम्स और गैलरीज की जांच करेगा। वे उन सभी वस्तुओं की पहचान करेंगे जो भारत से अवैध तरीके से बाहर लाई गई थीं ताकि उन्हें सम्मानजनक तरीके से वापस भारत भेजा जा सके।
कैसे भारत से बाहर पहुंचा यह अनमोल खजाना
भारत की यह अनमोल विरासत सात समंदर पार ऑस्ट्रेलिया तक कैसे पहुंची, इसके पीछे एक संगठित और गहरा आपराधिक नेटवर्क काम कर रहा था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय तस्कर सुभाष कपूर ने एक विशाल रैकेट तैयार कर रखा था। उसने विशेष रूप से तमिलनाडु के उन प्राचीन और एकांत मंदिरों को निशाना बनाया, जो चोल काल के थे और वहां से मूर्तियों को चोरी किया गया। इन मूर्तियों को बेचने के लिए सुभाष कपूर ने फर्जी दस्तावेज और नकली इतिहास के प्रमाण तैयार किए थे, जिससे दुनिया भर के बड़े म्यूजियम्स को उन पर कोई शक न हो। नेशनल गैलरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं ने भी इन जाली कागजातों को असली मानकर भारी रकम चुकाई थी।
अरबों की है इन विरासतों की मार्केट वैल्यू
इन प्राचीन कलाकृतियों की महत्ता सिर्फ सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बहुत अधिक है। अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट में समय के साथ इन ऐतिहासिक चीजों के दाम कई गुना बढ़ गए हैं। अनुमान के अनुसार, आज जो प्राचीन विरासत वापस भारत लौट रही है, उसकी कुल मार्केट वैल्यू 200 करोड़ रुपए से भी कहीं अधिक है। यह कदम दोनों देशों के बीच पनप रहे गहरे भरोसे और सच्ची दोस्ती को दर्शाता है। यह स्पष्ट है कि कैनबरा अब नई दिल्ली के साथ अपने सांस्कृतिक संबंधों को केवल कागजी औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि उन्हें दिल से निभाना चाहता है।
भविष्य की राह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया ऑस्ट्रेलिया दौरे के बाद इस तरह के सकारात्मक प्रयासों ने दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई दी है। आने वाले महीनों में इस पहल के तहत कई और ऐसी चोरी की गई मूर्तियां सम्मान के साथ अपनी मातृभूमि वापस लौटती हुई दिखाई देंगी। यह पहल न केवल भारत की खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक मिसाल पेश करेगी कि कैसे दो शक्तिशाली देश आपसी सम्मान और नैतिकता के आधार पर पुराने विवादों को सुलझा सकते हैं।
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