राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को कहा कि भारत को अपनी बिखर चुकी शक्ति और तैयारी को दोबारा संजोना होगा, लेकिन एक मजबूत राष्ट्र बनने के बाद भी वह दुनिया की दूसरी महाशक्तियों जैसा बर्ताव नहीं करेगा। उन्होंने जोर दिया कि भारत की परंपरा हमेशा सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की रही है और दुनिया के सामने यही उसकी पहचान बननी चाहिए।
नागपुर में संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग के समापन समारोह को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि सदियों की गुलामी और उपनिवेशवाद के कारण भारत अपनी कई मूल शक्तियों और तैयारियों से दूर हो गया। उनका कहना था कि भारत को परतंत्र बनाने वाले लोग न तो संख्या में ज्यादा थे और न ही किसी मायने में भारतीयों से बेहतर थे, फिर भी भारतीय समाज अपनी कुछ बुनियादी विशेषताओं को सहेज नहीं पाया और अपनी तैयारी गंवा बैठा।
हजार वर्षों की गुलामी का जिक्र
संघ प्रमुख ने कहा, "हम हजार वर्षों की गुलामी से गुजरे हैं। जिन्होंने हमें गुलाम बनाया, वे किसी भी तरह से हमसे बेहतर नहीं थे। हमने अपनी कुछ शक्तियों को सुरक्षित नहीं रखा और अपनी तैयारी खो दी। अब हमें उस तैयारी को फिर से खड़ा करना होगा।"
ताकतवर देशों की मनमानी पर निशाना
मौजूदा वैश्विक हालात की ओर इशारा करते हुए भागवत ने कहा कि आज दुनिया में ताकतवर देश अक्सर अपनी मर्जी से काम करते हैं। किसी का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि शक्तिशाली राष्ट्र कई बार अपनी इच्छा के मुताबिक दूसरे मुल्कों पर कब्जा कर लेते हैं, बमबारी करते हैं या वैश्विक संसाधनों की आपूर्ति को प्रभावित कर देते हैं।
उन्होंने कहा, "हम देखते हैं कि शक्तिशाली देश मनमानी करते हैं। अगर वे चाहें तो किसी दूसरे देश पर कब्जा कर लेते हैं। चाहें तो बम गिरा देते हैं या दुनिया की तेल आपूर्ति को प्रभावित कर देते हैं। भारत के बारे में दुनिया की धारणा ऐसी बननी चाहिए कि वह शक्तिशाली बनने के बाद भी ऐसा व्यवहार नहीं करेगा, बल्कि सभी को साथ लेकर आगे बढ़ेगा।"
ईरान-अमेरिका तनाव का उदाहरण
भागवत ने ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव का हवाला देते हुए कहा कि आज की दुनिया इतनी आपस में जुड़ी हुई है कि किसी एक इलाके का टकराव पूरी दुनिया को प्रभावित कर देता है। उनका कहना था कि भले ही कोई युद्ध दो देशों के बीच हो, लेकिन उसके आर्थिक और सामाजिक असर पूरी दुनिया के देशों पर पड़ते हैं।
उन्होंने कहा, "ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष हो रहा है, लेकिन उसके असर भारत समेत दुनिया के कई देशों में महसूस किए जाते हैं। तेल की कीमतों में बदलाव, व्यापार में बाधा और आर्थिक अनिश्चितता का प्रभाव सभी पर पड़ता है।"
संतुलित व्यवस्था की कमी
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि दुनिया आज तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बना पाई है, जो व्यक्ति, समाज और पर्यावरण के हितों के बीच संतुलन कायम कर सके। उनके अनुसार आधुनिक विश्व व्यक्तिगत अधिकारों, सामाजिक हितों और पर्यावरण संरक्षण के बीच तालमेल बैठाने की चुनौती से जूझ रहा है।
उन्होंने समझाया कि किसी व्यक्ति को बहुत अधिक अधिकार देने पर अक्सर सामाजिक हित प्रभावित हो जाते हैं, जबकि समाज को ज्यादा ताकत देने पर व्यक्ति के अधिकार सिमटने का खतरा खड़ा हो जाता है। इसी तरह भौतिक विकास के लिए कई बार पर्यावरण का दोहन कर दिया जाता है, जबकि पर्यावरण को बचाने की मांग विकास की रफ्तार पर असर डालती है।
शरीर, मन और बुद्धि के समन्वय पर जोर
भागवत ने कहा कि दुनिया इन्हीं दुविधाओं में उलझी हुई है और उसके पास ऐसा कोई व्यापक मार्गदर्शक सिद्धांत नहीं है, जो एक साथ सुख, शांति, विकास और पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया मानव शरीर, मन और बुद्धि के अलग-अलग विकास की बात तो करती है, मगर इन तीनों के समन्वित विकास का कोई मॉडल उसके पास नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी प्रभावी और टिकाऊ व्यवस्था के लिए शरीर, मन और बुद्धि के बीच संतुलन जरूरी है।
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