राजस्थान में बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर दो हफ्ते की रोक

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में मस्जिदों और मदरसों समेत अन्य निर्माणों को गिराने की प्रक्रिया पर दो सप्ताह के लिए अंतरिम रोक लगा दी है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इस मामले में कानूनी राहत के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

सुप्रीम कोर्ट से प्रभावितों को राहत

राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में पिछले कुछ समय से चल रही बुलडोजर की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश जारी किया है। न्यायालय ने मस्जिद, मदरसे, दरगाह और निजी मकानों को गिराने की प्रक्रिया पर दो सप्ताह के लिए अंतरिम रोक लगाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह सलाह दी है कि वे अपने संवैधानिक और कानूनी दावों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर स्थित डिवीजन बेंच में अपनी बात रखें। जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर विशेष याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने यह बड़ा फैसला सुनाया है।

कपिल सिब्बल ने अदालत में पक्ष रखा

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश पर करीब 40 प्रभावित व्यक्तियों ने इस मामले में याचिका दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जमीयत का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कड़े तर्क पेश किए। उनके साथ वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ैफ़ा अहमदी, निज़ाम पाशा, ताहिर हकीम और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड मंसूर अली खान ने भी अदालत में पैरवी की। कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि आवासीय संपत्तियों के साथ-साथ धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जा रहा है और सैकड़ों नोटिस थमाए गए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि प्रशासन को एकतरफा कार्रवाई करने के बजाय संविधान और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, अन्यथा प्रभावितों को ऐसी क्षति होगी जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं होगी।

जमीयत का जमीनी दौरा और कानूनी संघर्ष

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि 20 जून 2026 से जुड़ी है, जब जमीयत उलेमा-ए-हिंद का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल राजस्थान के प्रभावित सीमावर्ती जिलों का दौरा करने पहुंचा था। वहां उन्होंने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की, स्थितियों का जायजा लिया और ध्वस्तीकरण से जुड़े सभी दस्तावेजों को एकत्रित किया। इसी रिपोर्ट के आधार पर जोधपुर हाईकोर्ट में लगभग 40 याचिकाएं दायर की गईं, जबकि अन्य प्रभावितों ने भी स्वतंत्र रूप से याचिकाएं दीं। कुल मिलाकर 60 से अधिक मामले हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई के लिए आए थे।

बीते 7 जुलाई को हाईकोर्ट में बहस पूरी हुई थी और 13 जुलाई को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था। हालांकि, उस फैसले से राहत न मिलने के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के दौरान जमीयत के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन क़ासमी, उपाध्यक्ष मौलाना कारी मोहम्मद अमीन, राजस्थान इकाई के अध्यक्ष मौलाना हबीबुल्लाह क़ासमी और महासचिव मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री लगातार प्रभावित परिवारों और वकीलों के संपर्क में रहे।

आगे की रणनीति पर मौलाना मदनी का बयान

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने स्पष्ट किया कि संगठन अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि अदालत के निर्देश के मुताबिक अब जल्द ही जोधपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में याचिका दायर की जाएगी। उन्होंने भरोसा जताया कि अंत में कानून का शासन ही जीतेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि मस्जिदों, मदरसों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए जमीयत हर संभव मंच पर मजबूती के साथ संघर्ष करती रहेगी।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते गुरुवार को उन अवमानना याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया था, जिनमें आरोप लगाया गया था कि अलग-अलग राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में तय की गई गाइडलाइन्स का उल्लंघन करते हुए बुलडोजर का इस्तेमाल किया है। फिलहाल राजस्थान के मामले में मिली इस राहत ने प्रभावितों को बड़ी कानूनी सुरक्षा प्रदान की है।

https://www.indiatv.in/rajasthan/supreme-court-stays-bulldozer-action-against-mosques-and-madrasas-in-rajasthan-border-districts-areas-2026-07-17-1231821