मिथिला में मखाना कारोबार की अनूठी परंपरा: 'सैठ पूजा' के बिना नहीं शुरू होता नया सीजन, जानें इसके पीछे की धार्मिक मान्यता

बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में मखाना व्यापारी नए सीजन की शुरुआत से पहले पारंपरिक रूप से 'सैठ पूजा' का आयोजन करते हैं, जिसके बिना मखाने की खरीद-बिक्री और प्रसंस्करण का काम पूरी तरह से ठप रहता है।

बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र की पहचान देश-दुनिया में मखाना की वजह से है। यहाँ के किसानों और व्यापारियों के लिए मखाना केवल एक फसल नहीं, बल्कि उनकी जीविका और संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगले ही महीने से तालाबों से मखाना निकालने का काम शुरू होने वाला है। लेकिन इस नए सीजन की शुरुआत से ठीक पहले यहाँ एक बेहद खास और अनिवार्य परंपरा निभाई जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में सैठ पूजा कहा जाता है। मखाना कारोबारियों के बीच इस पूजा का इतना अधिक महत्व है कि इसके बिना काम की शुरुआत की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

व्यापारियों के लिए क्यों जरूरी है 'सैठ पूजा'?

बिहार के मधुबनी और दरभंगा जिलों में सबसे अधिक मात्रा में मखाना की खेती की जाती है। इन इलाकों में मखाना व्यापारियों के लिए नया सीजन शुरू करने से पहले पंडित जी से शुभ दिन और मुहूर्त निकलवाना सबसे पहला काम होता है। मुहूर्त तय होने के बाद ही विधि-विधान से पूजा का आयोजन किया जाता है। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि इस अनुष्ठान के बाद ही कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए दैवीय आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिसके बाद मखाना बाजार सुचारू रूप से काम करने लगता है।

मखाना का नया सीजन आने वाले महीने से शुरू होने जा रहा है। इसके बाद अगले 4 महीने तक मखाना उराही यानी तालाब से निकालना, गोरिया यानी मखाने के बीजों की सफाई और फोराफोरी यानी मखाने को भूनकर फोड़ने की प्रक्रिया का सिलसिला लगातार चलता रहता है। जिस तरह नई धान की फसल आने पर घरों में पूजा की जाती है ताकि पूरे साल अन्न का भंडार भरा रहे, ठीक उसी तरह मखाना व्यापारी भी अपने कारोबार की समृद्धि के लिए इस विशेष पूजा को संपन्न करते हैं। इसके बिना कोई भी नया काम हाथ में नहीं लिया जाता है।

दशकों पुराने मखाना घराने की जुबानी परंपरा का महत्व

इस अनूठी परंपरा के बारे में और अधिक जानकारी साझा करते हुए मधुबनी जिले के सबसे पुराने मखाना व्यापारी घरानों में से एक के सदस्य नवल किशोर प्रसाद ने विशेष बातचीत की है। उनका परिवार पिछले करीब 80-90 वर्षों से मखाना व्यवसाय के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम कर रहा है।

नवल किशोर प्रसाद बताते हैं कि हमारे यहाँ सैठ पूजा का बहुत बड़ा महत्व है। इसके बिना हम नए सीजन में कदम भी नहीं रखते हैं। जब तक यह पूजा संपन्न नहीं हो जाती, तब तक न तो हम किसानों से मखाना खरीदते हैं, न ही उसकी फोराफोरी का काम करते हैं और न ही उसे बाजार में आगे बेचने के लिए भेजते हैं।

पूजा में की जाती है तराजू और वजन मशीन की अर्चना

इस पूजा का मुख्य उद्देश्य व्यापार में सफलता, समृद्धि और सुरक्षा की कामना करना होता है ताकि पूरे साल धंधा अच्छा चले और किसी भी प्रकार का नुकसान न उठाना पड़े। इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान निम्नलिखित चीजों की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है:

  • विभिन्न देवी-देवताओं और भगवान सत्यनारायण की विधि-विधान से पूजा की जाती है।
  • व्यापार के मुख्य साधन यानी तराजू और आधुनिक वजन मशीन की भी पूजा की जाती है।
  • इसके साथ ही सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी जाती है और सभी उपस्थित लोगों को प्रसाद वितरित किया जाता है।

यह पूजा इसी महीने से शुरू हो जाती है और पूरे सावन के महीने तक जितने भी मखाना व्यापारी हैं, वे अपने-अपने स्तर पर इसे संपन्न करते हैं। इस अनुष्ठान के पूरा होने के बाद ही अगस्त के आखिर से तालाबों से मखाना निकालने, उसकी फोराफोरी करने और अन्य व्यावसायिक कार्यों की गति तेज होती है। इसके बाद ही पूरे देश और दुनिया के बाजारों में नया मखाना पहुंचना शुरू होता है।

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