क्या आपके बच्चे भी ऑटो में ठूंसकर भेजे जा रहे हैं स्कूल? सावधान हो जाएं, वरना भुगतने पड़ेंगे गंभीर स्वास्थ्य परिणाम

स्कूली बच्चों को क्षमता से अधिक ऑटो या रिक्शा में बिठाकर भेजना न केवल सड़क सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि यह उनकी हड्डियों और रीढ़ के विकास को भी नुकसान पहुंचा रहा है। डॉक्टर इसे बच्चों के भविष्य के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बता रहे हैं।

स्कूली बच्चों की सेहत के साथ खिलवाड़

सुबह का समय होता है, बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार होते हैं और माता-पिता उन्हें सुरक्षित और समय पर स्कूल भेजने की चिंता में रहते हैं। इस आपाधापी में, हम में से अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को ऑटो या ई-रिक्शा में बिठाकर निश्चिंत हो जाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आपके बच्चे उस वाहन के अंदर किस स्थिति में सफर कर रहे हैं? अगर आपने अब तक ध्यान नहीं दिया है, तो अब सतर्क होने का समय आ गया है। ऑटो चालकों की अतिरिक्त कमाई की भूख और हमारी थोड़ी सी लापरवाही मिलकर बच्चों के लिए एक ऐसी समस्या खड़ी कर रही है, जो न केवल उन्हें दुर्घटनाओं के मुहाने पर ले जाती है, बल्कि उनके शरीर की बनावट और हड्डियों के ढांचे को भी गंभीर रूप से बिगाड़ रही है। इस लापरवाही का नतीजा यह हो रहा है कि भविष्य में आपको अपने बच्चों को लेकर डॉक्टर के पास चक्कर लगाने पड़ सकते हैं।

क्षमता से कहीं ज्यादा बच्चों का बोझ

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर समेत पूरे राज्य में यह एक गंभीर ट्रेंड बन चुका है। सड़कों पर दौड़ते हुए छोटे ऑटो, जिनकी निर्धारित क्षमता 8 सीटों की होती है, उनमें 12 से 14 बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जा रहा है। स्थिति तब और भी ज्यादा भयावह हो जाती है जब हम बड़े सवारी वाहनों को देखते हैं। 16 सीट की क्षमता वाले इन वाहनों में 20 से 22 मासूम बच्चों को लादकर स्कूल पहुंचाया और वापस लाया जा रहा है। वाहन में जगह की कमी होने के कारण छोटे-छोटे बच्चों को बैठने के लिए पर्याप्त स्थान तक नहीं मिल पाता है। आलम यह है कि कोई बच्चा सीट के किनारे पर लटका हुआ सफर कर रहा है, तो कोई आगे की ओर झुकने को मजबूर है। ऐसे भी कई बच्चे हैं जो पूरी यात्रा के दौरान खड़े रहकर ही रास्ता तय करते हैं। मासूमों की यह मजबूरी अब उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ने लगी है।

हड्डी रोग विशेषज्ञों ने जताई गहरी चिंता

लंबे समय तक गलत पोश्चर में बैठकर सफर करने के कारण बच्चों की कमर, पीठ और रीढ़ की हड्डी पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है। यही मुख्य कारण है कि इतनी कम उम्र में ही बच्चों में गर्दन दर्द, सर्वाइकल और मांसपेशियों में खिंचाव की शिकायतें आम हो रही हैं। मेकाहारा अस्पताल के शिशु रोग विभाग और शहर के जाने-माने हड्डी रोग विशेषज्ञों ने इस चिंताजनक चलन की पुष्टि करते हुए बताया है कि अस्पताल में हर दिन ऐसे 3 से 4 मामले सामने आ रहे हैं। हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. सुरेंद्र शुक्ला का कहना है कि अधिकांश माता-पिता सुविधा के चक्कर में बच्चों को ऑटो या वैन में भेजते हैं, लेकिन ऑटो चालक ज्यादा कमाई के चक्कर में सुरक्षा और स्वास्थ्य के सभी नियमों को ताक पर रख देते हैं।

स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव

डॉ. सुरेंद्र शुक्ला के अनुसार, उनके पास हर महीने 4 से 5 ऐसे बच्चे इलाज के लिए आ रहे हैं जिनका शारीरिक पोश्चर बुरी तरह प्रभावित हो चुका है। चूंकि बच्चा रोजाना 20 से 40 मिनट तक इस असहज स्थिति में सफर करता है, इसलिए उनकी रीढ़ की हड्डी और गर्दन की नाजुक नसों पर लगातार गलत दबाव बनता है। छोटे बच्चों की हड्डियां अभी विकास की अवस्था में होती हैं, इसलिए लंबे समय तक इस तरह बैठने से उनमें स्थायी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। जब बच्चे ऑटो में एक-दूसरे के ऊपर लदकर बैठते हैं, तो उन्हें गाड़ी के झटकों को सहने और संतुलन बनाए रखने के लिए अजीब ढंग से झुकना या मुड़ना पड़ता है। इसका सीधा असर पीठ और कमर की मांसपेशियों पर पड़ता है, जिससे उनमें सूजन और अकड़न की समस्या जन्म लेती है। यदि समय रहते इस पर ध्यान न दिया गया, तो बच्चों की रीढ़ की हड्डी की प्राकृतिक बनावट भी बिगड़ सकती है। आगे चलकर यह स्थिति सर्वाइकल दर्द, कमर दर्द और मांसपेशियों की कमजोरी का स्थायी कारण बन सकती है, जो उनके खेलकूद और पढ़ाई की गतिविधियों को भी प्रभावित करेगा।

अभिभावकों के लिए विशेषज्ञ सलाह

चिकित्सकों का मानना है कि यदि इस समस्या की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो बच्चों को दवाओं की अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती। बचाव और सुधार के लिए डॉक्टर निम्नलिखित सुझाव देते हैं:

  • सबसे पहले बच्चों के बैठने के तरीके में सुधार करें और उन्हें ऐसी स्थिति में न बैठने दें जहां वे दबे हुए हों।
  • सफर के दौरान बच्चे की पीठ को पूरा सहारा मिलना चाहिए और उनके पैर या तो जमीन पर होने चाहिए या पायदान पर टिके होने चाहिए।
  • बच्चों को रोजाना कम से कम 20 से 30 मिनट शारीरिक गतिविधि और स्ट्रेचिंग का अभ्यास कराएं।
  • यदि बच्चा बार-बार कमर, गर्दन या पीठ में दर्द की शिकायत करे, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराएं।
  • जरूरत पड़ने पर डॉक्टर कैल्शियम, विटामिन-डी की जांच और फिजियोथेरेपी की सलाह दे सकते हैं।

अंत में, अभिभावकों के लिए सबसे जरूरी यह है कि वे अपने बच्चों को किसी भी हाल में ऐसे वाहन में न भेजें, जिसमें क्षमता से अधिक बच्चे भरे गए हों। एक छोटी सी सावधानी आपके बच्चे के भविष्य और स्वास्थ्य की रक्षा कर सकती है।

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